जांजगीर-चांपा जिले में भी सिंगूर जैसे ही हालात

Posted by Rajendra Rathore on 12:31 AM
-राजेंद्र राठौड़@छत्तीसगढ़ सर्वोच्च न्यायालय का पश्चिम बंगाल की सिंगूर परियोजना पर ऐतिहासिक फैसला विस्थापितों के संघर्ष की बड़ी जीत है। सिंगूर की तरह जिले में भी हालात अच्छे नहीं है। राज्य सरकार ने यहां तीन दर्जन परियोजनाओं और औद्योगिक समूहों के लिए किसान व ग्रामीणों की हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहित की है। प्रभावित किसान और ग्रामीणों के साथ विस्थापन से लेकर मुआवजे तक कई बार दगा हुआ है। कई परियोजनाओं की जमीनें अब तक उपयोग नहीं की गई है। इतना ही नहीं, जिले के कई इलाकों में उद्योगपतियों को उपकृत करने जमीनें छीनी गई हैं। ऐसे मजबूर किसान व ग्रामीण जमीन से दर-बदर होकर आंदोलन के सहारे अपना वाजिब हक मांगने अरसे से जूझ रहे है, लेकिन न तो राज्य सरकार उनकी सुन रही है और न ही उन्हें केन्द्र सरकार से राहत मिल रही है। इस स्थिति में विस्थापितों को अब न्यायालय ही बेहतर विकल्प नज़र आ रहा है। रमन सरकार द्वारा कई नामी कंपनियों से एमओयू करने के बाद जांजगीर-चांपा जिले में औद्योगिक संयंत्रों के विस्तार से विकास को गति जरुर मिल रही है, लेकिन संबंधित परियोजनाओं से प्रभावित हुए लोगों को उनका जायज हक नहीं मिल पा रहा है। प्रशासन से मिले आंकड़े के मुताबिक, दो दर्जन संयंत्रों के लिए 2350.836 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है, इसमें से 1656.769 हेक्टेयर निजी भूमि है। शेष शासकीय भूमि संयंत्रों को लीज पर मिली है। वर्तमान में केएसके महानदी, डीबी पॉवर, मड़वा प्रोजेक्ट, पीआईएल, लाफार्ज सहित आधा दर्जन संयंत्र संचालित हैं। कई संयंत्रों की स्थापना का कार्य चल रहा है। संयंत्र स्थापना के लिए प्रबंधन किसी भी हद को पार कर दे रहे हैं। पावर कंपनियों के खिलाफ भू-विस्थापित लामबंद हो समय-समय पर आंदोलन भी कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अब तक बेहतर नहीं निकल पाया है। ग्राम गोधना के हरिराम पिता महारथी साहू के नाम पर शामिल खाते में कुल 9 एकड़ कृषि भूमि थी, लेकिन अब सिर्फ 2 एकड़ भूमि ही बची है। हरिराम बताते हैं कि कर्नाटका पॉवर कंपनी लिमिटेड ने उद्योग लगाने के लिए उनकी 7 एकड़ भूमि अधिग्रहित की, जिसमें से करीब एक एकड़ भूमि का मुआवजा अब तक नहीं मिला है। वे आगे बताते हैं कि उनके परिवार में कुल 15 सदस्य हैं, जिनका 2 एकड़ कृषि भूमि से पालन पोषण कर पाना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा कंपनी प्रबंधन ने रोजगार देने के वादे भी किए थे, लेकिन उद्योग का अब तक कहीं अता-पता नहीं है। इसलिए रोजगार के लाले भी पड़ गए हैं। ग्राम गोधना के शत्रुहन लाल साहू पेशे से मजदूर हैं। गांव में इनके नाम पर करीब एक एकड़ कृषि भूमि थी, जिसमें से 82 डिसमिल भूमि कर्नाटका पॉवर कंपनी लिमिटेड ने अधिग्रहित कर ली है। शत्रुहन ने बताया कि भूमि के बदले उन्हें मुआवजा राशि तो दी गई, लेकिन प्लांट शुरू नहीं होने की वजह से रोजगार नहीं मिला। वे बताते हैं कि पहले खेती-बाड़ी व मजदूरी करके वे किसी तरह जीवन-यापन कर लेते थे, लेकिन अब परिवार पालना मुश्किल हो गया है। मुआवजा बतौर मिली राशि कई कामों में खर्च हो चुकी है। अब रोजगार की सबसे बड़ी समस्या है। हाथ खाली हो गए हैं और रोजगार के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। ग्राम गोधना के गोविंदराम साहू के घर कुल 19 सदस्य हैं। गोविंद के तीनों पुत्रों की शादी हो गई है। वे बताते हैं कि कुछ साल पहले तक खेती-बाड़ी करके गुजारा हो जाता था, लेकिन केपीसीएल के लिए कृषि भूमि अधिग्रहित होने के बाद अब पेट पालना मुश्किल हो गया है। उनके पास अब थोड़ी कृषि भूमि ही बची है, जिसमें धान का उत्पादन कर किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कृषि भूमि पॉवर कंपनी के पास बिकने के कारण उनके दो पुत्रों को मजदूरी के लिए रायगढ़ जिले में जाना पड़ा है। एक पुत्र गांव में ही रहकर मजदूरी कर रहा है। कंपनी ने जमीन लेते समय कई वादे किए थे, लेकिन उन वायदों का अब तक कुछ पता नहीं है। केपीसीएल से प्रभावित रतिराम साहू व उनके परिवार के समक्ष अब जीवकोपार्जन की सबसे बड़ी समस्या है। ग्राम गोधना निवासी रतिराम का कहना है कि कंपनी ने उनसे 99 डिसमिल भूमि ली है। मुआवजा तो तीन साल पहले ही मिल गया है, लेकिन अन्य सुविधाएं नहीं मिल रही है। वे बताते हैं कि जिस वक्त उनसे जमीन ली गई, तब कंपनी के अफसरों ने प्लांट में स्थायी नौकरी तथा अन्य सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया था। कंपनी के अफसर जमीन खरीदने के बाद अब गांव में नजर ही नहीं आते। भूमि बिकने के बाद हो रही समस्याओं को लेकर कई बार शासन-प्रशासन तक गुहार लगाई गई, लेकिन सभी से कोरा आश्वासन ही मिला। ग्राम गोधना निवासी मदनलाल साहू कृषक हैं। वे बताते हैं कि केपीसीएल के लिए उनकी कुल 53 डिसमिल भूमि अधिग्रहित की गई। कंपनी प्रबंधन ने 13 डिसमिल भूमि का मुआवजा तीन साल पहले 13 लाख 80 हजार रुपए एकड़ की दर से दिया, लेकिन शेष 40 डिसमिल भूमि का मुआवजा अब तक नहीं मिला है। मुआवजे के लिए कंपनी के अफसर घुमा रहे हैं। इसकी शिकायत एसडीएम, कलक्टर से लेकर कई उच्चाधिकारी व जनप्रतिनिधियों से की जा चुकी है, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया है। भूमि खरीदते समय पॉवर कंपनियों ने नियम-कायदों का गंभीरता से पालन करने की दुहाई दी थी, लेकिन अधिकांश कंपनी फिसड्डी साबित हुए। केपीसीएल हो या केएसके महानदी पॉवर कंपनी लिमिटेड, अथेना, डीबी पॉवर या फिर आरकेएम पॉवर। केपीसीएल ने प्रभावितों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के दावे किए थे, लेकिन अब कंपनी उन वायदों से मुकर रही है। प्रबंधन से जुड़े अफसरों का कहना है कि प्लांट ही स्थापित नहीं हो पाया है तो सुविधाएं आखिर कैसे दे पाएंगे। डभरा क्षेत्र में स्थापित आरकेएम पॉवर ने जहां आदिवासियों की जमीन फर्जी तरीके से खरीदकर उन्हें भूमिहीन बना दिया है तो वहीं डीबी पॉवर पर भी फर्जी तरीके से आदिवासी भूमि खरीदे जाने की कई शिकायतें लंबित है। जिले में भूअर्जन के दौरान राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन की भूमिका उद्योगों के पक्ष में ही रही है। इसके कई बड़े उदाहरण हैं, जिसमें सरकार ने उद्योगपतियों से सांठगांठ कर नियमों की खुलकर धज्जियां उड़ाई हैं। केएसके महानदी को बांध बेचे जाने का मामला, डीबी पॉवर व आरकेएम पॉवर द्वारा खुलेआम आदिवासी भूमि खरीदे जाने का मामला, ग्रीन बेल्ट के लिए मिली सरकारी जमीन पर आरकेएम पॉवर द्वारा पेट्रोल पंप लगाए जाने का मामला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। ये सभी फर्जीवाड़े जिला प्रशासन व राज्य सरकार की आंखों के सामने ही खुलकर हुए, लेकिन शासन-प्रशासन ने हस्तक्षेप करने के बजाय मामले को किसी तरह निपटाकर उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का काम किया। अकलतरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम नरियरा में केएसके महानदी पॉवर कंपनी को राज्य शासन ने बांध को ही बेच दिया। बांध सिंचाई विभाग का था, जिसे आसपास की सिंचाई के लिए करीब 50 साल पहले बनवाई गई थी। सिंचाई विभाग ने इस बांध को अनुपयोगी बताया था, जबकि क्षेत्र के किसानों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट किया था कि उस बांध से सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई होती है। दिलचस्प बात यह भी है कि जिस समय रोगदा बांध बना, उसमें कई किसानों की भूमि गई थी। बांध बनने से वर्ष 2012 तक बांध के दायरे में आई जमीन राजस्व रिकार्ड में किसानों के नाम पर ही दर्ज थी। 46 सालों से उस जमीन का नामांतरण नहीं हुआ था, लेकिन केएसके महानदी पॉवर कंपनी लिमिटेड को जब बांध व उसके आसपास की भूमि देने की बात आई तो जिला प्रशासन ने सरकार के इशारे में रातों-रात जमीन का नामांतरण करा दिया। इसी तरह जिले के बलौदा विकासखंड अंतर्गत ग्राम मड़वा-तेंदूभाठा में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी 500-500 मेगावाट की दो यूनिट स्थापित कर रही है। पावर प्लांट व रेल लाइन विस्तार के लिए ग्राम मड़वा, तेंदूभाठा सहित 17 गांवों की कृषि व शासकीय भूमि उपयोग में लाई गई है। कंपनी द्वारा उपयोग में लाई गई भूमि को लेकर एक बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है। केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एमओयू की शर्तो के तहत् छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी को मड़वा प्रोजेक्ट के लिए कुल 508 हेक्टेयर कृषि व शासकीय भूमि उपयोग में लाने की अनुमति दी थी। करार में स्पष्ट किया गया था कि जिन किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहित की जाएगी, उसके एवज में संबंधित भू-विस्थापितों को पुनर्वास नीति के तहत् जरूरी सुविधाएं दी जानी है, लेकिन मड़वा-तेंदूभाठा प्रोजेक्ट ने इस शर्त का पहले ही उल्लंघन कर किया है। पॉवर कंपनी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को गुमराह करते हुए प्रोजेक्ट विस्तार के लिए 508 हेक्टेयर भूमि की जगह 650 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि उपयोग में लाई है। इसमें कृषि व शासकीय भूमि दोनों समाहित है, जबकि इसकी सूचना पर्यावरण व वन मंत्रालय को नहीं दी गई है। पॉवर कंपनी ने इतनी भूमि में अपने प्रोजेक्ट का विस्तार सहित आवासीय परिसर, रेल लाइन विस्तार व अन्य कार्य कराया है। अनुमति से अधिक भूमि उपयोग में लाए जाने संबंधी यह मामला पिछले दो सालों से दबा हुआ था, लेकिन कुछ माह पहले मामले की शिकायत कुछ भू-विस्थापितों ने छत्तीसगढ़ शासन सहित केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में की, तब इस बात का खुलासा हुआ। बताया जाता है कि प्रारंभिक जांच में शिकायत सही पाई गई है और पॉवर कंपनी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की शर्ताे का उल्लंघन करते हुए 508 हेक्टेयर की जगह 650 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया है। मामले में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय कई बार नोटिस जारी कर चुका है, लेकिन पॉवर कंपनी से किसी तरह का जवाब अब तक नहीं मिला है। जिले के डभरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम उच्चपिंडा में निर्माणाधीन आरकेएम पावरजेन की गड़बडिय़ों के खुलासे एक-एक करके सामने आ रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, नहर, बांध व निस्तारी तालाबों पर कब्जा करने वाली इस कंपनी का एक बड़ा गड़बड़झाला उजागर हुआ है। आरकेएम पावरजेन के तत्कालीन महाप्रबंधक जी परमजोती ने वर्ष 2008 में ग्राम बांधापाली, घिवरा, कानाकोट, उच्चपिंडा आदि गांवों की शासकीय भूमि पर पौधरोपण की अनुमति के लिए तहसील न्यायालय डभरा में आवेदन प्रस्तुत किया था। कंपनी के प्रबंधक ने छग भू-राजस्व संहिता की धारा 239 के तहत इन गांवों की करीब 150 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई थी। भू-आवंटन के लिए प्रस्तुत किए गए आवेदन के साथ कंपनी प्रबंधन ने चाही गई भूमि का खसरा नंबर एवं नक्शा की सत्य प्रतिलिपी प्रस्तुत की थी। नियमानुसार, ग्रीन बेल्ट के लिए भू-आवंटन का अधिकार तहसील न्यायालय को नहीं था। बावजूद इसके तत्कालीन तहसीलदार केएल सोरी ने वर्ष 2008-09 में ग्राम घिवरा की 29.25 एकड़, ग्राम कानाकोट की 3.39 एकड़, उच्चपिंडा की 61.43, बांधापाली की 103.76 सहित कुल 197.84 एकड़ जमीन पौधरोपण के लिए आरकेएम पावरजेन कंपनी लिमिटेड को आवंटित कर दी। शासकीय भूमि आवंटित होने के बाद कंपनी प्रबंधन ने उस जमीन पर ग्रीन लैंड तो विकसित नहीं किया, लेकिन भू-आवंटन के कुछ माह बाद बांधापाली की भूमि में पेट्रोल पंप खोल दिया। वहीं शेष भूमि का उपयोग आवासीय परिसर, दफ्तर व अन्य कार्यों के लिए किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे गड़बड़झाले को कंपनी प्रबंधन ने जिला प्रशासन की आंखों के सामने अंजाम दिया है। इसके बावजूद जिला प्रशासन ने ग्रीन लैंड के लिए आवंटित भूमि की उपयोगिता की छानबीन कराना भी जरूरी नहीं समझा।

विश्व में ढाई करोड़ लोग चढ़े मानव तस्करी की भेंट

Posted by Rajendra Rathore on 10:32 PM
मानव तस्करी जैसा जघन्य अपराध हमारे देश में बड़े पैमाने पर जारी है। देश में ऐसे दानव तुल्य लोग भी हैं, जो मानव को बेचने और खरीदने का गोरखधंधा करते हैं और यह सारा कुछ समाज के बड़े-बड़े ठेकेदारों और बड़े-बड़े कर्णधारों की नाक तले होता आया है। हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी के बाद मानव तस्करी विश्व का सबसे अधिक लाभदायक गैर कानूनी व्यापार है।
मानव की खरीद-बिक्री कोई ऐसा कारोबार नहीं है, जिसे आसानी से चलने दिया जाए और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने वाले लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। यह काला कारोबार मानवीयता, सभ्यता और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ हमारे धर्मो को भी चुनौती देता है। वर्तमान समय में विश्व के बहुत से देशों को जिन चुनौतियों का सामना है उनमें से एक, मानव तस्करी की समस्या है। विश्व स्तर पर प्रकाशित होने वाले कुछ आंकड़ों से पता चलता है कि पूरे विश्व में ढाई करोड़ से अधिक लोग, मानव तस्करी की भेंट चढ़े हैं और मानव तस्करी में लिप्त लोगों ने इस अमानवीय व गैर कानूनी व्यापार से अरबों डालर कमाए हैं। मानव तस्करी का शिकार होने वाले लोग महिलाओं, बच्चों बल्कि पुरुषों सहित समाज के सभी वर्गों से संबंध रखते हैं। बच्चों को भीख और चोरी जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए तथा महिलाओं को यौन व्यापार तथा घरों में काम करने और पुरुषों को उद्योगिक केन्द्रों तथा अत्याधिक कठिन व हानिकारक कामों के लिए मानव तस्करी का शिकार बनाया जाता है। मानव तस्करी का सबसे अधिक स्पष्ट व पीड़ादायक पहलू यह है कि अधिकांश मामलों में लोग स्वेच्छा से इसके लिए तैयार हो जाते हैं और उन्हें उसके परिणामों के बारे में सही जानकारी नहीं होती। युरोपीय और पश्चिमी देशों के लिए अधिकांश मानव तस्कर, मनुष्यों का शिकार करते हैं। इस कारोबार से जुड़े लोगों के संबंध कई राजनेताओं से होते हैं, इस वजह से यह कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। युरोपीय आयोग की जांच से पता चलता है कि विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं, न्यायपालिका के विभागों, पलायनकर्ताओं से संबंधित संगठनों तथा कई सरकारी, क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व संस्थाओं की गतिविधियों के बावजूद मानव तस्करी के संदर्भ में अभी तक विश्वस्त आंकड़ें प्राप्त नहीं हो सके हैं। मानव तस्करी का शिकार होने वालों की सही संख्या का पता लगाना असंभव है, क्योंकि यह पूरी प्रक्रिया गुप्त रूप से की जाती है। इस संदर्भ में तैयार की जाने वाली बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में मानव तस्करी की बढ़ती घटनाओं के बारे में सही आंकड़े मौजूद न होने पर बल दिया गया है, किंतु, प्रत्येक दशा में संयुक्त राष्ट्रसंघ की रिपोर्ट के अनुसार मानव तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए विश्व समुदाय के भरसक प्रयासों के बावजूद, प्रत्येक वर्ष लगभग 40 लाख लोग मानव तस्करी की भेंट चढ़ते हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे होते हैं। हर वर्ष मानव तस्करी का शिकार होने वाले बच्चों और महिलाओं की संख्या 25 लाख से अधिक है। मानव तस्करी पूर्वी व केन्द्रीय युरोप, आफ्रीका, एशिया तथा दक्षिणी अमरीका से बेल्जियम, जर्मनी, इटली, थाईलैंड, तुर्की, अमरीका जैसे देशों तथा इस्राईल के लिए की जाती है। ब्रिटेन के मानव तस्करी निरोधक विभाग ने वर्ष 2011 में अपनी रिपोर्ट में घोषणा की थी कि मानव तस्करी का शिकार होकर ब्रिटेन पहुंचने वाले लोगों में से 11 प्रतिशत को घरों में काम पर लगाया गया, वहीं 1 प्रतिशत लोगों के अंगों की तस्करी की गई, जबकि 17 प्रतिशत लोगों को अपराधिक गतिविधियों में ढकेला गया और 22 प्रतिशत लोगों से बेगार कराया गया। इसके अलावा 31 प्रतिशत लोगों का यौन शोषण किया गया और 18 प्रतिशत लोगों की तस्करी के कारणों का पता नहीं चल पाया। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं और बच्चों के यौन शोषण से की जाने वाली कमाई ही लगभग 28 अरब डालर प्रति वर्ष है। युरोपीय संघ के आकंड़ों के अनुसार मानव तस्करी का शिकार होने वाला हर बच्चा, तस्करी करने वाले गुट के लिए 2 लाख डालर से अधिक आमदनी का साधन होता है। युरोप के वे देश जहां के लिए मानव तस्करी बढ़ रही है उनमें ब्रिटेन भी है। कनाडा भी उन देशों में शामिल है, जहां मानव तस्करी के माफिया सक्रिय हैं। अमरीका में बहुत से लोगों को यौन दासता के लिए खरीदा व बेचा जाता है। अमरीकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार इस देश में हर महीने 400 से अधिक ऐसी लड़कियों का यौन शोषण किया जाता है, जिनकी आयु 12 से 14 वर्ष के बीच होती है। विभिन्न देशों में मानव तस्करी के विरुद्ध सक्रिय संगठनों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि विश्व में इस अमानवीय व गैर कानूनी व्यापार के विस्तार का एक कारण इस समस्या के निवारण के लिए सरकारों द्वारा आवश्यक कदम नहीं उठाया जाना है। अमरीका में प्रकाशित होने वाले आकंड़ों से पता चलता है कि इस देश में मानव तस्करी का शिकार होने वाले हर 800 लोगों के लिए केवल एक तस्कर को न्यायालय में दंडित किया जाता है और उसे मिलने वाला दंड भी बहुत साधारण होता है, इसीलिए दंड पाने वाले तस्कर जेल से निकलने के बाद पुनः इसी काम में व्यस्त हो जाते हैं। भारत देश की राजधानी दिल्ली में मानव तस्करी के बढ़ते आंकड़ों के मद्देजनर हाल ही में सरकार ने सभी राज्यों में मानव तस्करी निरोधक सेल तथा हेल्पलाईन सेवा शुरू की है। नियंत्रण सेल को खोलने का एकमात्र मकसद यही है कि मानव तस्करी की घटनाओं को किसी तरह नियंत्रित की जा सके। इसके लिए पुलिस विभाग द्वारा जनप्रतिनिधियों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों व आमजनों से सहयोग लिया जा रहा है। सेल के लिए अलग से टोल फ्री फोन नंबर लगाए गए है, जिस पर फोन करके मानव तस्करी से संबंधित कोई भी सूचना दी जा सकती है। विश्व में बढ़ती मानव तस्करी की घटनाओं कीे रोकथाम के लिए वर्तमान में भारत ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयास किए जा रहे हैं, बावजूद इसके अंतर्राष्ट्रीय नियमों में इस अमानवीय व्यापार को रोकने के लिए कड़े प्रावधान व दंड की जरूरत है।

चिंतन से ज्यादा चरित्र की जरूरत

Posted by Rajendra Rathore on 10:29 PM
भारत अब ज्यादा शहरीकृत है, भारत की जनता ज्यादा उम्मीदें रखने लगी है और शासन की नई व्यवस्था तलाश रही है। कांग्रेस अभी सब कुछ नहीं हारी है। उसे इस बात से सांत्वना मिल सकती है कि गुजरात में सफलता के बावजूद भाजपा की स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है।
ऐसे में यूपीए सरकार को बचे हुए कार्यकाल में ये दिखाना होगा कि पार्टी परिणाम भी दे सकती है। राहुल गांधी की बड़ी गलती यह रही कि उन्हें लगा कि सरकार में सुधार किए बिना ही वह संगठन को पुनर्जीवित कर सकते हैं। सरकार में आत्मविश्वास बहुत कम हो गया है और इसे लौटाना ही कांग्रेस की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहले पार्टी नेताओं को संदेश का महत्व समझाना होगा। साथ ही नेतृत्व, खासकर प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को अपने संदेशों में और ज्यादा स्पष्ट होना पड़ेगा। ऎसा नहीं हुआ तो उनकी खामोशी से बने नैतिक व वैचारिक निर्वात को तमाम अन्य शक्तियां भर देंगी। हालाँकि, पुरातनपंथी संघ की बंधक बनी भाजपा शासन की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं सुझा पा रही, लेकिन कांग्रेस को पहचानना होगा कि लोगों में गुस्सा उबल रहा है। अलबत्ता, भारतीय जनता पार्टी से थोड़ा बेहतर होने से काम नहीं चलेगा। कांग्रेस पार्टी को अभी चिंतन से ज्यादा चरित्र की जरूरत है।

अमृत की खोज में लगी हुई है कांग्रेस

Posted by Rajendra Rathore on 12:17 AM
प्रयाग के महाकुंभ में करोड़ों श्रद्धालुओं का संगम हो रहा है। ऐसा माना जाता है कि संगम में डुबकी लगाकर जिंदगी को नई दिशाएं, नई प्रेरणा और नई ऊर्जा का अनुभव होता है, शायद इसी मकसद से कांग्रेस ने भी गुलाबी शहर जयपुर में अपनी दो पीढियों के संगम का विचार बनाया। कांग्रेस की युवा पीढ़ी और अनुभवी पीढ़ी का संगम जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में हो रहा है, लेकिन, ये शिविर सिर्फ संगम नहीं, समुद्र मंथन है। कांग्रेस अपने भविष्य के लिए खुद के समुद्र से मंथन कर अमृत की खोज में लग गई है। वर्ष 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली जीत के बाद नई दिल्ली में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भाजपा का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि भाजपा की चिंतन बैठक अब चिंता बैठकों में बदल गई हैं, आज कांग्रेस के हालात भी बहुत अच्छे दिखाई नहीं देते और हो सकता है कि इसी वजह से कांग्रेस को चिंतन शिविर की याद आई हो। 40 साल में कांग्रेस का ये चौथा चिंतन यज्ञ हो रहा है। पहला चिंतन शिविर 1974 में, दूसरा 1998 में और तीसरा 2003 में शिमला में आयोजित किया गया था। पिछले चिंतन शिविर में कांग्रेस ने ‘एकला चलो रे’ का फैसला लिया। राजनीतिक तौर पर यह नारा काम नहीं आया और 6 साल तक कांग्रेस को इंतजार करना पड़ा। अपनी खस्ता हालत और राजनीतिक अनुभवों का फायदा उठाते हुए सोनिया गांधी ने खुद के नेतृत्व में लिए हुए फैसले को ही बदलने में भलाई समझी और एकला चलो रे से कांग्रेस सबको साथ लेकर चलने को तैयार हो गई, जिसका उसे फायदा भी हुआ कि 19 दलों के गठबंधन यूपीए को उस वक्त सरकार बनाने का मौका मिल गया, जबकि हर कोई एनडीए सरकार की वापसी की बात कर रहा था। शिमला से जयपुर तक आने में कांग्रेस को 9 साल लग गए, तो क्या ये कांग्रेस की चिंता का नतीजा तो नहीं कि इस बार कांग्रेस को लगने लगा है कि अगला आम चुनाव पार्टी के लिए आसान नहीं है। 2009 के चुनावों के वक्त कांग्रेस आश्वस्त सी थी कि उसे फिर मौका मिलने वाला है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 2010 में ऐलान भी किया था कि पार्टी जल्द से जल्द चिंतन शिविर का आयोजन करेगी, ताकि मंथन से पार्टी का रूप निखर सके। कांग्रेस को अब अगले चुनाव के लिए नए चेहरे की जरूरत समझ आने लगी है। कांग्रेस नेताओं की बात मानें तो ये तय सा है कि कांग्रेस अगला आम चुनाव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लड़ने नहीं जा रही है। वैसे भी यूपीए 2 के कार्यकाल के दौरान कांग्रेसी नेताओं ने अपनी नौकरी और हाजिरी पक्की करने के लिए हजारों बार राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की मांग की है। राहुल प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं या नहीं या वो सोनिया की तरह किसी और को खड़ाऊं सौंपना चाहते हैं, यह खुद राहुल ही जानते हैं, लेकिन इससे भी अहम है कि क्या अगले चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनने वाली है या बेवजह ही कर्ण बनने के बहाने बनने लगे हैं। कांग्रेस के इस शिविर में युवराज राहुल गांधी को राजपाट सौंपे जाने की मांग सार्वजनिक तौर पर हो जाए, इसका इंतजाम कर दिया गया है। चिंतन शिविर में आने वाले साढ़े तीन सौ नेताओं में से 160 युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के नेता हैं। पहली बार चिंतन शिविर में इतनी बड़ी हिस्सेदारी युवाओं की हो रही है, इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि देश का करीब दो तिहाई वोटर इस वक्त नौजवान है और नौजवानों का गुस्सा कांग्रेस की सरकार ने हाल में देखा ही है। लेकिन, क्या उस सवाल का जवाब मिल गया है कि जब दिल्ली गैंगरेप की घटना से आक्रोशित हिंदुस्तान का नौजवान कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहा था, तब युवा हृदय सम्राट राहुल गांधी कहां थे, उन्होंने उस पीडित को न्याय दिलाने के लिए क्या किया? संसद में 9 बरस तक राहुल ने नौजवानों के लिए क्या किया? कौन से अहम् मुद्दे उठाए? यूपी के चुनावों में मुट्ठी बांधकर भाषण देने वाले राहुल को कब किस और बात पर गुस्सा आया? अब सवाल है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव में उतरना चाहती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी की इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि राहुल की ताजपोशी की बात बेमानी है, वो तो पार्टी में सोनिया गांधी के बाद दूसरे नंबर के नेता हैं ही। लेकिन, क्या कांग्रेस राहुल गांधी को भाजपा के वरिष्ठ व कद्दावर नेता नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतारने के लिए तैयार है, जिनका सामना राहुल ने गुजरात में नहीं किया। राहुल से ज्यादा इस बात पर मंथन करने की जरूरत है कि क्या कांग्रेस अपने क्षेत्रीय नेताओं को ताकतवर बनाना चाहती है, क्या पार्टी उनकी बात सुनने को तैयार है? वर्तमान वर्ष में देश के 9 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और यदि वो अपने क्षत्रपों को ताकत दे, तो शायद हालात बेहतर हो सकते हैं, क्या उसके पास मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुकाबले, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के, गुजरात में नरेन्द्र मोदी के या फिर ओडिसा में नवीन पटनायक, बिहार में नीतीश कुमार के और तमिलनाडु में जयललिता या करूणानिधि के मुकाबले कोई क्षेत्रीय नेता है। कांग्रेस में इंदिरा गांधी के जमाने से क्षेत्रीय नेताओं को खिलौना समझने की आदत रही है और केन्द्रीय नेतृत्व अपने मन और मूड के हिसाब से उनके साथ खेलता रहा है। चिंतन शिविर का मकसद मेडिटेशन है यानी खुद के भीतर झांकना और शीशे को साफ कर अपने को पहचानना। अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि बाहर की लड़ाई लड़ना आसान होता है, लेकिन अंदर की कमजोरियों को दूर करने के लिए पहले कुछ कड़े फैसले करने होते हैं, वो भले ही पसंद ना हों, मगर उन्हें अपनाना होता है। समुद्र मंथन में अमृत के लिए तो सभी लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन जो विष को स्वीकार करता है, वो देवों का देव महादेव कहलाता है। क्या कांग्रेस ऐसे में नीलकंठ बनने को तैयार है?

क्या निकल कर आएगा चिंतन शिविर से

Posted by Rajendra Rathore on 1:01 AM
देश की कानून व अर्थव्यवस्था लगातार बद्तर होती जा रही है। देश को बेहतर नेतृत्व प्रदान करने का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी हर मामलों में विफल हो चुकी है। लगातार बढ़ती महंगाई के बाद अब सिलेंडर का कोटा बढ़ाकर दर्द की दवा देने का दावा करने वाली केन्द्र सरकार ने वास्तव में डीजल के दाम नियंत्रणमुक्त कर लोगों का दर्द बढ़ाया ही है। बढ़ती महंगाई की मार झेल रही देश की जनता को कांग्रेस से कोई खास उम्मीद नहीं है, बावजूद इसके जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर से क्या निकल कर आएगा, इस पर जरूर नजर है। देश की राजधानी दिल्ली में कुछ दिन पहले ही कई बड़ी वारदातें हुई, तब सरकार के तरफ से बयान आया कि सरकार चिंतित है। प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्रीगण देश की सुरक्षा को लेकर गहरें विचार में डूबे हुए हैं, लेकिन नतीजा क्या हुआ, यह सबके सामने है। इसे सरकार की कमजोरी और विफलता ही कहें कि पाकिस्तान ने दोस्ती का हाथ बढ़ाकर देश में आतंकवादी हमले कराए और भारत-पाक की सीमा पर तैनात जवान के सिर को धड़ से अलग कर दिया गया, फिर भी सरकार नरम रवैया अपनाती रही, लेकिन इस मामले से आक्रोशित भारतीय सेनाध्यक्ष ने जब पाकिस्तान को ललकारा, तब पाकिस्तान ने भारत से संधि करने का प्रस्ताव रखा। अगर, कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार वास्तव में देशहित को लेकर चिंतित है, तो इस तरह की घटना हुई कैसे, यह भी एक बड़ा सवाल है। मौजूदा हालात ऐसे है कि देश में आतंकवाद, नक्सलवाद व गंभीर किस्म के अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, इन विषयों पर चिंतन करने के बजाय देश की वरिष्ठ नेता श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित अन्य दिग्गज नेता आगामी चुनाव को लेकर चिंतन कर रहे हैं। इन नेताओं द्वारा इस मसले पर विचार नहीं किया जा रहा है कि देश से आतंकवाद, नक्सलवाद को आखिर खत्म कैसे किया जाए? इन्हें इस बात का दर्द भी नहीं है कि हाल ही में हुए आंतकवादी हमले में बाघा सीमा पर तैनात जवान मारे गए हैं, जिनके परिजनों के आंखों से आसू अब तक नहीं सूखे है। लिहाजा उनके घर पहुंचकर ढ़ाढस बांधे। शहीदों के परिजन सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता के भूखे नहीं हैं, क्या सरकार उन जवानों को वापस लौटा सकती है। यह संभव नहीं है, लेकिन भविष्य में होने वाली इस तरह की घटनाओं को चिंतन करके योजनाबद्ध तरीके से टाला जा सका है। मगर, कांग्रेस पार्टी का जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में शुक्रवार से शुरू हो रहा चिंतन शिविर देश के हालातों पर चिंतन करने के लिए नहीं, अपितु आगामी चुनाव को लेकर रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है, इसमें कोई शक नहीं है। तभी तो कांग्रेस की चिंतन बैठक से पहले राहुल गांधी को पीएम बनाने की मांग मुखर हो रही है। कांग्रेस का यह चौथा चिंतन शिविर है और पहली बार चिंतन शिविर में इतनी तादाद में कांग्रेस के युवा नेता पहुंच रहे हैं, जिससे यह माना जा रहा है कि इस बार बुजुर्गो के चिंतन के बदले युवाओं का हल्लाबोल ज्यादा हो सकता है। वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के काल में दो चिंतन बैठकें हो चुकी हैं। पंचमढ़ी में कांग्रेस ने एकला चलो का नारा दिया था, तो शिमला में गठबंधन की खोज के सहारे सत्ता में पहुंचने की राह तलाशी गई थी। यह वह काल था, जब राजनीति के मंजे हुए कांग्रेस नेताओं पर सबकी नजर लगी थी। जयपुर से युवाओं की बढ़ी हुई भूमिका का संदेश जा सकता है। इस बैठक में युवा कांग्रेस के 54 और एनएसयूआइ के 45 सदस्य होंगे। इससे ऐसा लग रहा है कि अवसर देखकर कांग्रेस का युवा वर्ग युवाओं की भूमिका बढ़ाने का मामला उठा सकते हैं। यह आशंका भी है कि कुछ लोग वरिष्ठ नेताओं की ओर से युवाओं की राह में बिछाए जाने वाले अवरोध का जिक्र कर सकते है। चिंतन शिविर में पहुंचे उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा ने तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री बताया है। सीएम बहुगुणा का कहना है कि राहुल गांधी के अंदर पीएम बनने की सारी काबिलियत मौजूद है और अगला लोकसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। भले ही उनका यह तर्क अपने स्तर पर सही हो, लेकिन एक ही परिवार के लोगों को आमजनता अपने सिर पर रखकर कब तक ढ़ोते रहेंगे। भारत देश स्वतंत्र हो चुका है, लेकिन यहां रहने वाले लोग गुलामी की जंजीरों से अब तक जकड़े हुए हैं। आमजन पहले राजा-महाराजा की गुलामी करते रहे और अब कांग्रेस पार्टी की गुलामी करनी पड़ रही है। कांग्रेस पार्टी तो राजा-महाराजाओं के जमानें की तरह पीढ़ीवाद चला रही है, जिसका खामियाजां न चाहते हुए भी आमलोगों को भुगतना पड़ रहा है। सत्ता में नए चेहरों को आने से रोका जा रहा है, यह कहां तक उचित है। खैर, केन्द्र में कांग्रेस पार्टी जब से सत्तासीन हुई है, तब से विचार का ही दौर चल रहा है। अब देखना यह है कि जयपुर में आयोजित इस चिंतन शिविर से क्या निकल कर आता है। क्या वाकई में किसी विशेष पहलू पर विचार-विमर्श होगा या यह शिविर केवल चुनाव की तैयारियों तक ही सीमित रह जाएगा।

आत्महत्या को मजबूर ‘‘अन्नदाता’’

Posted by Rajendra Rathore on 10:02 PM
देश की अधिकांश आबादी कृषि कार्य पर निर्भर है और इस कृषि के काम को करने वाला टाटा या अम्बानी जैसे उद्योगपति नहीं बल्कि, एक आम किसान है, जो दिन रात एक करके फसल को तैयार करता है, उसे आज सरकारी मदद के आभाव में कर्ज के बोझ ले दबकर आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उपेक्षा कर्जदारी की वजह से अन्नदाता आत्महत्या कर रहे हैं तो सोचा जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है।
देश में पिछले एक साल में 14 हजा 4 किसानों ने उपेक्षा, अभाव और कर्जदारी की वजह से आत्महत्या क ली है। प्रत्येक 12 घंटों में देश के किसी न किसी हिस्से में भूमि-पुत्र आत्महत्या कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों को देखें तो 1995 के बाद से लेकर अब तक 2 लाख 70 हजार भूमिपुत्रों ने आत्महत्या है। जबकि कृषि संबंधित मामलों के जानकार मानते हैं कि ये आंकड़े ज्यादा भी हो सकते हैं, क्योंकि इस तरह की आत्महत्याओं का सही ढंग से आंकलन नहीं किया जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि देश में पिछले साल हुई कुल आत्महत्याओं की संख्या 1 लाख 35 हजार में से 10 फीसदी मौतें किसानों की हुई हैं। ये वो आंकड़े हैं जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं। इनमें वो आंकड़े शामिल नहीं है, जिनका संज्ञान पुलिस नहीं लेती या फिर जिनको लेकर राज्य सरकारों के पास बहानों की पूरी फेहरिस्त है। महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक के बाद सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले छत्तीसगढ़ में सामने आए हैं। सबसे बुरी स्थिति महाराष्ट्र की है जहाँ पिछले साल 3 हजार 337 किसानों ने आत्महत्या की है। वर्ष 2010 में महाराष्ट्र में 3 हजार 141 किसानों ने आत्महत्या की थी। महाराष्ट्र के अलावा अन्य जिन प्रदेशों में मौत के आंकड़ों में वृद्धि हुई है, उनमें मध्य प्रदेश, गुजरात ,तमिलनाडु और हरियाणा शामिल हैं। आश्चर्यजनक बात है कि खुद केन्द्रीय मंत्री शरद पवार एनसीआरबी के इन आकड़ों को मानने से इनकार करते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के आने से ठीक पूर्व पिछले एक सप्ताह के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में लगभग दो दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है, इनमें सर्वाधिक 6 मौते विदर्भ में हुई हैं। इनके अलावा उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु से किसानों के आत्महत्या किए जाने की खबरें मिल रही हैं। कर्ज माफी के तमाम दावों के बावजूद मध्यप्रदेश में किसानों की मौत का आंकड़ा 1 हजार 113 से बढ़कर 1 हजार 326 हो गया है। खेती की समस्या से जूझते इन राज्यों के अलावा सबसे चौकाने वाले तथ्य असम जैसे पूर्वोतर राज्य से सामने आए हैं, जहां 2010 में 269 किसानों ने आत्महत्या की थी, जो 2011 में बढकर 312 तक पहुंच गई है। मौत के आंकड़े उन विभिन्न पैकेजों की भी पोल खोलती हैं, जिनकी घोषणा केन्द्र व राज्य सरकारें करती हैं।
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल हुई मौतों की संख्या साल 2010 में हुई 15 हजार 933 मौत की अपेक्षा कम है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि राज्य सरकारों ने हर वर्ष बढ़ती जा रही किसानों की आत्महत्या को स्वीकार न करने की ठान ली है। किसानों की आत्महत्या को लेकर छत्तीसगढ़ शासन के पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में अब तक एक भी किसान ने कृषि संबंधित परेशानी के कारण आत्महत्या नहीं की है, जबकि राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने ग्रामीण इलाकों में हुई आत्महत्याओं को किसानों की आत्महत्या मान लिया गया है। वहीं ओडिशा के कृषि मंत्री प्रदीप महारथी अपने राज्य में होनी वाली मौतों के पीछे किसानों की बदहाल स्थिति को जिम्मेदार न मानते हुए कहते हैं कि किसान लोन लेकर जुए खेल जाते हैं और जब चुका नहीं पाते तो आत्महत्या कर लेते हैं। पश्चिम बंगाल के गरीब, बदहाल किसानों की मौत वहाँ के कृषि सचिव को दारूबाजी की परिणिति लगती है। एनसीआरबी के आंकड़ों के सामने आने के बाद भी गुजरात सरकार ने आश्चर्यजनक ढंग से कहा है कि हमारे यहाँ एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है, जबकि ये आंकड़े राज्य सरकार ने ही एनसीआरबी को भेजी थी। मेरा मानना है कि पुलिस की ओर से थाना स्तर पर जिस तरह आत्महत्याओं के मामले निपटाए जाते है, उससे उनके वास्तविक कारणों का पता नहीं चल पाता है। क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के यह आंकड़े राज्य की पुलिस की ओर से ही भेजे जाते हैं। मगर ये कहीं नहीं बताया जाता है कि आत्महत्या करने वाले ने आर्थिक कारणों से ऐसा किया है। गंभीर बात यह है कि अधिकतर मामलों में पुलिस अन्य कारणों का उल्लेख करते हुए मामले का निपटारा कर देती है। किसानों की आत्महत्या का एक सबसे बड़ा कारण आर्थिक तंगी ही है। जबसे किसानों की आत्महत्या के मामले उजागर होने लगे हैं, तबसे पुलिस ने किसानी की वजह से आत्महत्या के खाने को एक तरह से हटा ही दिया है। उसकी जगह पर अब अज्ञात कारणों से आत्महत्या लिखना सरल और सहज समझा जाने लगा है।
आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को सरकार मुआवजा न देने के सौ बहाने बनाती है। अगर जमीन बाप के नाम पर है और सारा काम बेटा करता है और भूखमरी के हालत में आत्महत्या कर लेता है तो सरकार उस किसान की आत्महत्या को गणना में नहीं लेती है, क्योंकि खेती की भूमि उसके नाम न होकर उसके बूढ़े बाप के नाम है। फिर सरकार कहती है कि इस हालत में किसान के बेटे ने कर्ज से उत्पन्न समस्याओं के कारण आत्महत्या नहीं की। परिवार का बड़ा लड़का बाप के बूढ़े होने के कारण खेती का काम तो संभाल लेता है, परंतु उसको यह कभी विचार नहीं आ सकता कि बाप के होते हुए भूमि अपने नाम करवा ले। पिछले दो दशक में किसानों के हालात बुरे हुए हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ हर साल बढ़ती जा रही है। कृषि प्रधान देश में आज ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं कि किसान अपने आप को हर तरफ से असहाय महसूस कर रहा है। किसानों के आत्मह्त्या की वजह केवल एक ही कारण से हो रही है, ये कहना थोड़ा सा अनुचित होगा, मगर इसकी सबसे शक्तिशाली वजह किसानो का कर्ज में डूबा होना ही रहा है। ये कर्ज कभी सरकार का होता है और कभी साहूकार का, और जब किसान को ऐसा लगने लगता है कि वह अब कर्ज को नहीं चुका पाएगा और उसे समाज में भारी अपमान सहना पड़ेगा तो उसे सबसे आसान रास्ता आत्महत्या ही नजर आता है। उसे उस समय यह बिल्कुल समझ नहीं आता है कि वह क्या करे और घबराहट में वह आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा देता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि फसल तो बहुत अच्छी होती है, लेकिन उस फसल को बेचने के बाद उसे उसका भुगतान इतने दिनों बाद मिलता है को वह कर्ज कई गुना हो चुका होता है और मासूम किसान उसे चुकाने में खुद को असमर्थ पाता है। वर्तमान स्थिति में अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो जो किसान आज पूरे देश के लिए अन्न पैदा कर रहा है वो अनाज सिर्फ अपने लिए ही पैदा करेगा और उसके बाद जो स्थिति होगी उसके बारे में सोचा भी नही जा सकता।

जीवन से लेकर मृत्यु तक गीत-संगीत- सपना

Posted by Rajendra Rathore on 9:16 PM
0 पार्श्व गायिका सपना अवस्थी से राजेन्द्र राठौर की बातचीत

संगीत, जो हर हिंदुस्तानी के तन-मन में रचा-बसा है। यहां की आबो हवा में संगीत है। जीवन से लेकर मृत्यु तक गीत-संगीत हैं। हम हवा में, रोशनी में, पहाड़ों की वादियों में संगीत को महसूस करते हैं। वह संगीत अगर आपके पास हो तो आप भी खुश होने का बहाना ढूंढ लेते हैं, इसीलिए मैं संगीत को हमेशा जीने की कोशिश करती हूं। इसीलिए भी कि यही मेरा कैरियर बन चुका है और खुद हमेशा आनंदित महसूस करती हूं। मैं बहुत खुशनसीब हूं कि ईश्वर ने मेरे हिस्से संगीत दिया।

यह कहना है जाज्वल्य देव लोक महोत्सव में अपनी प्रस्तुति देने पहुंची मशहूर पार्श्व गायिका सपना अवस्थी का। बचपन से ही गीत-संगीत में विशेष रूचि रखने वाली सपना अवस्थी ने बातचीत में बताया कि वे नवाबों और नफासतों की नगरी लखनऊ में पैदा हुई। उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे। शायद यही असर था कि मेरी पढ़ाई भी उसी रास्ते पर हुई। उन्होंने संस्कृत से एमए किया, लेकिन संगीत के प्रति बचपन से ही रूचि थी। इस वजह से उन्होंने भातखंडे संगीत महाविद्यालय से संगीत में विशारद किया। इसके साथ ही साथ छोटी उम्र से थियेटर भी किया करती थी। पिता की दिलचस्पी कला में ज्यादा थी, इसीलिए उनके कहने से थियेटर के साथ संगीत की शिक्षा को भी जारी रखा। वे बताती है कि बचपन में उनका मन बहुत बावरा था, तरह-तरह के सपने देखा करता था। संस्कृत में एमए करने के बाद वे शास्त्रीय संगीत सीखने दिल्ली आई और यहां आकर रंगमंच से जुड़ गई। अपने पति कार्तिक के साथ मिलकर उन्होंने अवधी थियेटर की नींव रखी। टीवी के पहले सोप-ऑपेरा ‘हम लोग’ में अभिनय भी किया।

गांव की माटी से सराबोर, अल्हड़ बंजारन से खनकदार आवाज उनकी अपनी तरह एक खालिस आवाज थी, जिसने नदीम श्रवण से लेकर रहमान जैसे शीर्षस्थ संगीतकारों को भी बेतरह लुभाया। सपना बताती है कि उनके सैकड़ों गीत सुपर-डूपर हिट हुए, इंडस्ट्री में उन्होंने दो दशकों का लंबा समय गुजारा है, उनके संगीत का यह सफर अब भी अनवरत जारी है। गीत-संगीत के मामले में उनका तर्क है कि हर कोई तानसेन या बैजू बावरा बन जाए या रफी और लता मंगेशकर बन जाए, यह जरूरी नहीं है। उसका अंश होना भी हमारे लिए गर्व का विषय है। जो अंश मिला है, उसी से मैं संतुष्ट हूं और उसे पूरी ईमानदारी से लोगों तक पहुंचा रही हूं। स्वर कोकिला लता मंगेशकर को अपना आदर्श मानने वाली सपना अवस्थी जी कहती है कि लता बाई ने शुरू में फिल्म में एक्टिंग भी की थी, अगर एक्टिंग में ही रह जातीं तो आज की लता मंगेशकर को हम कहां ढूंढ पाते?

उन्होंने बताया कि हम लोग संगीतकार चित्रगुप्त के बेटे मिलिंद की सगाई में उनके घर गए थे। इंडस्ट्री के नामचीन लोग उसमें शामिल हुए थे। वहीं गीतकार समीर जी ने मेरी पहचान शेखर कपूर से कराई। मेरी आवाज की समीर जी ने काफी तारीफ कर दी थी। मुझे पहला ब्रेक ‘दुश्मनी’ में मिला, लेकिन मेरी रिलीज होने वाली पहली फिल्म थी ‘इक्का राजा रानी’, जिसमें मेरा गाया गाना हिट हो गया। उसके बाद तो मेरे कैरियर में उछाल आ गया। सच कहूं तो मेरे कैरियर में समीर जी का महत्व अपनी जगह है, लेकिन संगीतकार नदीम-श्रवण ने जिस तरह मेरी आवाज का उपयोग किया, उसने मुझे कहां से कहां पहुंचा दिया। सबसे ज्यादा लोकप्रियता मुझे फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’ के गीत ‘परदेसी परदेसी जाना नहीं’ से मिली। इसमें मेरी आवाज को ‘सपना अवस्थी की आवाज’ की पहचान मिली। इस गाने से प्रसिध्दि मिली और अवार्डों की झड़ी लगी। बस, एक बात का अफसोस है आमिर खान की दूसरी फिल्म ‘मेला’ में भी गाने के बावजूद उनसे ढंग से कभी बातचीत नहीं हो पाई। उनकी और भी फिल्मों में गाने की चाहत है।

उन्होंने बताया कि हिन्दी, बंगाली, उड़ीया, राजस्थानी सहित विभिन्न भाषाओं के लगभग 100 फिल्मों में मैंने 200 से त्यादा गाने गाए हैं। मगर एल्बमों को जोड़ दें तो गानों की संख्या 2500 से ऊपर चली जाएगी। शुरू-शुरू में मेरे गाने आज के आइटम सांग्स जैसे थे। उस समय मेरे गानों की काफी आलोचना भी हुई, लेकिन आज वैसे ही गाने हिट हो रहे हैं और लोगों को पसंद आ रहे हैं। मुझे खुशी है कि एआर रहमान के संगीत निर्देशन में मैंने ‘छैयां-छैयां’ गाया था, जो आइटम में ऑल टाइम हिट माना जाता है। एक बात बता दूं कि विदेश में जब शो करने जाती हूं तो सबसे ज्यादा फरमाईश छैयां-छैयां की ही होती है। इस गाने को विदेशी सुनते और उस पर थिरकते हैं।

सपना अवस्थी बताती है कि मुझे जो भी कामयाबी मिली है, इसमें मेरे पति कार्तिक का बहुत बड़ा योगदान है। वही मेरे लिए बात करते हैं। कांप्टीशन गुणी लोगों के बीच होती है, मैं खुद को गुणी नहीं मानती। सच तो यह है कि मुंबई में मुझे ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा। सब कुछ आसानी से और बिना मांगे मिलता रहा, इसीलिए मन को तसल्ली ज्यादा है। घर में प्रतिदिन ज्यादा नहीं सिर्फ 40 मिनट गाने का रियाज करती हूं। कभी तानपुरे पर तो कभी हारमोनियम पर। सपना कहती है कि इस सच को स्वीकार करने में मैं कोताही नहीं करती कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों के यहां शादी आदि के मौके पर गाने जाती हूं। उनमें मुंबई, राजस्थान, दिल्ली, कोलकाता का नंबर ज्यादा आता है। वहां जाने को कुछ लोग बुरा भी मानते हैं लेकिन मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता है।

सपना अवस्थी का कहना है कि छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत का अपना एक अलग वजूद है। छत्तीसगढ़ी गीतों को सुनने में काफी मजा आता है, दिल में रोमांच भर जाता है। सबसे अच्छी बात यह है कि छत्तीसगढ़ के दर्शक बहुत जबरदस्त है। इससे भी कही ज्यादा अच्छी छत्तीसगढ़ की अतिथि परंपरा है, जहां हर किसी को घर-परिवार जैसा सम्मान मिलता है। जब भी छत्तीसगढ़ में प्रोग्राम देने का न्योता मिलेगा, मैं जरूर आऊंगी, क्योंकि यहां के दर्शकों के प्यार आगे कोई सीमा या सरहर आड़े नहीं आ सकती। पार्श्व गायिका सपना अवस्थी ने कहा कि छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया........!!!

किशोर दा से नहीं मिल पाने का अफसोस- सानू

Posted by Rajendra Rathore on 8:59 PM

0 सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक कुमार सानू से विशेष बातचीत

एक ही दिन में 28 गाने रिकार्ड करने वाले, पांच बार सर्वश्रेष्ठ पाश्र्व गायक का पुरूस्कार जीतने वाले और सन् 2009 में पद्मश्री अवार्ड से नवाजे गए पार्श्व गायक कुमार सानू को किशोर दा से नहीं मिल पाने का अफसोस है। बॉलीवुड के मशहूर प्लेबैक सिंगर सानू ने जांजगीर में आयोजित जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव में अपने सुरों से धूम मचाई।
कोलकाता में जन्में कुमार सानू का मूल नाम केदारनाथ भट्टाचार्य है। उनका पारिवारिक माहौल पूरी तरह से संगीतमय रहा है। पिता पशुपतिनाथ संगीत के शिक्षक रहे, बड़ी बहन रेडियो पर गाती थी। सन् 1989 में जगजीत सिंह ने उन्हें संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी से मिलाया और उन्होंने अपना पहला गाना फिल्म जादूगर में गाने का मौका कुमार सानू को दिया।पार्श्व गायक कुमार सानू ने बातचीत में कहा कि वर्तमान दौर में के गानों में फूहड़ता है, इस बात को श्रोता भी जानते हैं।
फूहड़ गीतों के माध्यम से हम आने वाले पीढ़ी के लिए माहौल खराब कर रहे हैं। सानू ने बताया कि किशोर दा ही उनके आदर्श हैं, लेकिन उन्हें न तो किशोर दा के साथ गाने का मौका मिला और न ही मुलाकात कर सके। महेश भट्ट की फिल्म आशिकी से रातोंरात सिने जगत पर छा जाने वाले कुमार सानू ने आगे बताया कि वे अपने 22 वर्ष के फिल्मी कैरियर में 17 हजार से अधिक गाने हिंदी और बांग्ला में गा चुके हैं। साजन, 1942 ए लव स्टोरी, सडक़, फूल और कांटे, आंखें, जुर्म सहित लगभग 350 फिल्मों में कुमार सानू ने गीत गाए हैं। फिलहाल उनके तीन एलबम ट्रेक पर हैं, जिनमें से एक संभवत: वेलेंटाईन डे पर रिलीज होगा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में यह उनका तीसरा प्रोग्राम रहा है, इससे पहले वे बिलासपुर व रायपुर में अपनी प्रस्तुति दे चुके है।
छत्तीसगढ़ के लोगों को गीत-संगीत से बहुत ज्यादा लगाव है तथा यहां के दर्शक बहुत अच्छे हैं, जो कलाकारों का बहुत सम्मान करते हैं। सानू ने कहा कि फिल्म नगरी मुंबई में हर रोज सैकड़ों नए गीतकार-संगीतकार आते हैं, मगर वही कामयाब होते है, जिन्हें श्रोता व दर्शकों का स्नेह मिलता है। सानू ने बताया कि छत्तीसगढी़ फिल्म व गीत संगीत भी सुनने में अच्छे लगते हैं, बशर्ते फुहड़ता न रहे।

अन्ना, आन्दोलन और यूपीए सरकार

Posted by Rajendra Rathore on 12:15 AM

एक मजबूत लोकपाल की कवायद भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए है, लेकिन सरकार के अब तक के तौर-तरीकों से लगता नहीं कि वह देश को कोई सशक्त लोकपाल दे पाएगी। पिछले साल के मुकाबले भ्रष्टतम् देशों की सूची में इस वर्ष भारत सात पायदान और ऊपर चढ़ गया है। इसकी पुष्टि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट से हो रही है, जो इस बात का सुबूत है कि भ्रष्टाचार से लड़ने की हमारी नीयत में कहीं न कहीं खोट है। गांधीवादी नेता अन्ना के आंदोलन के शंखनाद से यूपीए सरकार एक बार फिर सहम गई है।

देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ यूपीए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि तमाम् राजनीतिक दलों का नजरिया भी भ्रष्टाचार के मुद्दे और लोकपाल के गठन को लेकर कभी स्पष्ट नहीं रहा है। यदि ऐसा नहीं होता, तो संसदीय समिति द्वारा लोकपाल का मसौदा तैयार करते समय उसमें भ्रष्टाचार से निपटने के मजबूत उपायों की झलक जरूर मिलती। अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता वाली समिति ने निचले स्तर की नौकरशाही और सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के मामले में चौबीस घंटे के भीतर जिस तरह से पलटी खाई है, उससे स्पष्ट है कि लोकपाल के प्रावधानों और अधिकारों को लेकर संसद में कितने गहरे मतभेद हैं और समिति पर किस तरह का दबाव है। स्थायी समिति की रिपोर्ट को यदि मंजूर कर लिया जाए, तो एक ऐसे लोकपाल का खाका सामने आता है, जिसके दायरे में प्रधानमंत्री, संसद के भीतर सांसदों का व्यवहार, न्यायपालिका, निचले स्तर की नौकरशाही और सीबीआई आदि नहीं होंगे, बल्कि इसके दायरे में कॉरपोरेट, मीडिया और एनजीओ आएंगे। ऐसे में बीते एक साल से जन लोकपाल के लिए आंदोलन कर रहे अन्ना हजारे और उनके साथी अगर सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है? स्थायी समिति की रिपोर्ट में अन्ना हजारे को संसद की ओर से दिए गए कई आश्वासनों को पूरा नहीं किया गया है। दूसरी ओर, पिछले दस दिनों से लोकसभा में कामकाज बुरी तरह से ठप है। खासकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी व यूपीए सरकार के कई दिग्गज मंत्रियों का वैसे भी पहले से ही बुरा हाल है। ऐसे में नहीं लगता कि इस शीतकालीन सत्र में लोकपाल के स्थायी समिति की रिपोर्ट पेश भी हो पाएगी। सरकार की ओर से अब तक जो कवायद हुई है, उससे स्पष्ट भी हो रहा है कि सरकार मामले को सुलझाने के बजाय और उलझाना चाहती है। लोकपाल को लेकर सरकार के ढुलमुल रवैये से स्पष्ट है कि वह वही कर रही है, जैसा पहले से सोचा है। गंभीरता से अगर विचार किया जाए तो भ्रष्टाचार की यह गंदगी ऊपर से नीचे की ओर बह रही है, लिहाजा निचले दर्जे के 57 लाख कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में रखना व्यावहारिक नहीं लगता। इस भ्रष्टाचार रूपी गंदगी को रोकने का उपाय सरकारी लोकपाल में नजर नहीं आ रहा है।

यहां बताना लाजिमी होगा कि पहली बार जब अन्ना का अनशन शुरू हुआ, तो सरकार को विश्वास नहीं था कि अन्ना के समर्थन में देश भर के लोग आगे आएंगे, लेकिन जब अन्ना के पक्ष में देश भर के लोग खड़े हुए तब तो सरकार पूरी तरह से हिल गई और यह जोड़तोड़ शुरू हुई कि उनके आंदोलन को आखिर कैसे खत्म कराया जाए? कई दिनों के बाद आखिरकार खुद प्रधानमंत्री डॉ सिंह ने अन्ना हजारे को पत्र लिखकर वादा किया कि जल्द ही देश में मजबूत लोकपाल बिल लाया जाएगा। यही नहीं, संसद में भी उनकी तीन मुख्य मांगों पर सहमति बनी थी, लेकिन अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रधानमंत्री के वायदे एवं संसद की भावना की अवमानना करके बिल्कुल कमजोर एवं लचर विधेयक का मसौदा तैयार किया और ऐसा करना मामूली बात नहीं है। अन्ना हजारे इसी बात से ज्यादा आक्रोशित है कि मनु सिंघवी ने प्रधानमंत्री के बात की अनदेखी आखिर क्यों की। हजारे का कहना है कि इससे पूर्व संसद की स्थायी समिति के अधिकांश सदस्यों ने विधेयक का मसौदा स्वीकार कर लिया था, लेकिन फिर इसमें कुछ बदलाव किए गए। चूंकि राहुल गांधी इस मुद्दे पर बोल चुके हैं और वही स्थायी समिति के सदस्यों पर दबाव डाल रहे हैं। अलबत्ता राहुल नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार मुक्त देश हो, क्योकि ऐसा होने पर उनकी शक्तियां घट जाएंगी। अन्ना ने राहुल गांधी से पूछा भी है कि आप हमारी सेवा करने के लिए सत्ता में हैं या अपने रुख को मजबूत करने के लिए? यहां तक कि स्कूली बच्चे भी समझ सकते हैं कि सरकार देश की जनता के साथ खिलवाड़ कर रही है। विधेयक के सामाजिक संगठन के मसौदे पर बहस न कराने पर अन्ना ने सरकार की आलोचना भी की है तथा सी और डी श्रेणी के कर्मचारियों को केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के तहत लाए जाने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाएं हैं। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि अगर संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन 22 दिसंबर तक मजबूत एवं कारगर लोकपाल विधेयक नहीं आया, तो 27 दिसंबर से रामलीला मैदान पर उनका अनिश्चितकालीन अनशन शुरू होगा। इसके बाद वह पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में लोगों से भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाले राजनीतिक दलों एवं नेताओं को हराने की अपील करेंगे।

यही नहीं, वह दो साल बाद होने वाले आम चुनाव के पहले भी देशभर का दौरा करेंगे। लोकपाल विधेयक पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के खिलाफ गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के आक्रामक शंखनाद से केन्द्र सरकार एक बार फिर से हिलती नजर आ रही है। अन्ना को मनाने के लिए सरकार ने कई दांव पेंच शुरू कर दिए हैं। प्रधानमंत्री डॉ सिंह व उनकी पूरी टीम को अब इस बात की ज्यादा चिंता सताने लगी है कि अन्ना के आगामी आंदोलन से केन्द्र में यूपीए सरकार का समूचा सूपड़ा साफ हो जाएगा। इधर इसी बात को लेकर कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी भी सोंच में पड़ गई हैं और अब यह चिंतन किया जा रहा है कि आखिर यूपीए सरकार अपने अस्तित्व को आगे कैसे कायम रख पाएगी। बहरहाल, संसदीय समिति के विधेयक में मीडिया और एनजीओ को भी लोकपाल के दायरे में रखा गया है, जबकि अन्ना व उनके समर्थक प्रधानमंत्री, सांसदों, न्यायधीशों और राजनीतिक दलों को इसके दायरे में रखने की मांग कर रहे हैं। एक तरह से उनका कहना वाजिब भी है क्योंकि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को सीवीसी के दायरे में लाया जा रहा है, जो खुद सरकार के अधीन काम करते है। ऐसा करने से किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी?

टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में जॉब्स ने लाई नई क्रांति

Posted by Rajendra Rathore on 1:27 AM
दुनिया ने कम्प्यूटर और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कई प्रयोग देखे हैं, लेकिन तकनीक में नई क्रांति लाने वाले एप्पल के दूरदृष्टा सह संस्थापक स्टीव जॉब्स की बात ही अलग है। एप्पल की वेबसाइट से लेकर उसके उत्पाद बाजार में अलग ही नजर आते हैं। पर्सनल कम्प्यूटर से लेकर आईपॉड, आईपैड और आईफोन के जनक जॉब्स जो चाहते थे, उसे पाकर ही रहते थे। इस महान दूरदृष्टा का बुधवार को 56 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

स्टीव पॉल जॉब्स का जन्म 24 फरवरी 1955 को सैन फ्रांसिस्को में हुआ था। उनके माता-पिता विश्वविद्यालय के अविवाहित छात्र-छात्रा थे। माँ जोआन शिबल थीं तथा पिता अब्दुलफत जंदाली सीरियाई मूल के थे। एक स्थानीय हाईस्कूल में जॉब्स को गर्मियों के दिनों में लेट पैकार्ड के संयंत्र में पालो आल्टो में काम करने का मौका मिला। उन्होंने वहाँ एक साथी छात्र स्टीव वोजनियाक के साथ मिलकर काम किया, फिर एक ही साल बाद उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और वीडियो गेम बनाने वाली कंपनी अटारीके साथ काम करने लगे।

उन्होंने अपने दोस्त स्टीव वोजनियाक के साथ मिलकर एक स्थानीय कम्प्यूटर क्लब में जाना शुरू किया। इसके कुछ दिनों बाद ही जॉब्स ने उपनगरीय कैलिफोर्निया के एक गैराज में अपने हाईस्कूल के दोस्त स्टीफेंसन वोजनियाक के साथ अपनी खुद की कंपनी शुरू की। उन्होंने अपनी कंपनी का नाम अपने पसंदीदा फल एप्पलपर रखा। वर्ष 1974-75 में सबसे पहले जॉब्स ने एप्पल-1 नाम से एक मशीन लाँच की। ये पहली ऐसी मशीन थी, जिसे तैयार करने के लिए उन्होंने किसी से धन उधार नहीं लिया और न उस बिजनेस का हिस्सा किसी को दिया।

इसके बाद वे एप्पल-टू बनाने में जुट गए, जो 1977 के कैलिफोर्निया के कंप्यूटर मेले में दिखाया गया। नई मशीनें महँगी थीं। इसलिए जॉब्स ने एक स्थानीय निवेशक माइक मारकुला को ढाई लाख डॉलर कर्ज देने के लिए मनाया, उसी राशि से वोजनियाक को साथ लेकर उन्होंने एप्पल कंप्यूटर्स नाम की कंपनी बनाई। इसके ठीक 7 साल बाद जॉब्स ने 1984 में मैकिंटॉश बनाया, मगर उसके प्रचार के पीछे एप्पल में वित्तीय मुश्किलें चल रही थीं। मैकिंटॉश की बिक्री कम हो रही थी और कई लोग जॉब्स के तानाशाही रवैये से परेशान थे। इसके चलते कंपनी में एक सत्ता संघर्ष हुआ और जॉब्स को कंपनी से निकाल दिया गया। तब तक उन्होंने और चीजें सोच ली थीं। 1985 में उन्होंने नेक्स्ट कंप्यूटरनाम से कंपनी बनाई। इस कंपनी ने एक साल बाद ग्राफिक ग्रुप को खरीद लिया।

जॉब्स स्टीव की सोच हमेशा ऐसी थी कि वे भीड़ से अलग नजर आए और इसीलिए वे हमेशा ज्यादा से ज्यादा मेहनत करते थे। उनके परिवार में पत्नी, लॉरेन और तीन बच्चे हैं। वर्ष 1991 में विवाह से पहले के प्रेम संबंध से उनकी एक बेटी भी है। वर्ष 2004 में उनके अग्नाशय के कैंसर का इलाज हुआ, तब जॉब्स ने कंपनी से स्वास्थ्य कारणों से छुट्टी ले ली और उसके बाद अगस्त में एप्पल के सीईओ पद से भी उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। वर्ष 2009 में उनका यकृत बदला गया था। जॉब्स दुनिया के अग्रणी व्यवसायियों में से एक थे। उन्होंने आईपॉड तथा आईफोन जैसे उपकरण दुनिया को दिए। आईफोन के नए मॉडल 4 एस के लाँच के एक दिन बाद ही उनका निधन हो गया। पाओ आल्टो, कैलिफोर्निया में कैंसर के बिगड़ने से उन्होंने अंतिम साँस ली। अंतिम समय में उनकी पत्नी और निकट परिजन मौजूद थे।

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उनकी मृत्यु पर दुख प्रकट करते हुए कहा कि जॉब्स की निधन से दुनिया का एक दूरदृष्टा चला गया। दुनिया के ज्यादातर लोगों को उनके निधन की सूचना उसी उपकरण के जरिए मिली, जिसका उन्होंने आविष्कार किया था। इससे बड़ी श्रद्धांजलि उन्हें और क्या हो सकती है। प्रौद्योगिकी क्षेत्र की एक अन्य जानीमानी हस्ती बिल गेट्स ने जॉब्स के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा है कि जॉब्स का गहरा प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियों तक महसूस किया जाएगा। बहरहाल, कंपनी के मुताबिक स्टीव अपने पीछे एक ऐसी कंपनी छोड़ गए है, जिसे सिर्फ वही बना सकते थे। लिहाजा उनकी आत्मा हमेशा ही एप्पल की बुनियाद रहेगी।