वेलेंटाइन की सच्चाई

Posted by Rajendra Rathore on 4:09 AM

14 फरवरी यानि वेलेंटाइन डे, इसकी कल्पना करते ही दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। वैसे तो वेलेंटाइन डे का इतिहास काफी पुराना हैं, लेकिन भारत में 165 साल पहले हमने वेलेंटाइन डे का नाम सुना, ये जानकार आपको भी आश्चर्य होगा कि मसूरी के एक अंग्रेज ने अपनी बहन को लिखे खत में वेलेंटाइन डे का जिक्र किया था। वेलेंटाइन डे पर युवक-युवती सब कुछ भूलकर प्रेम में डूब जाते हैं, उन्हें लगता है कि दुनिया में प्रेम से बढ़कर और कोई दूसरा काम नहीं है। मगर सच्चाई इससे विपरित होती है। होना तो यह चाहिए कि इस वेलेंटाइन डे की तमाम अच्छाइयों को हम अपनी संस्कृति में मिलाएँ और फिर इसे मनाएँ तब देखिए जिंदगी कितनी खुशहाल लगने लगेगी।
पिछले साल की बात है मेरे जान पहचान की एक लड़की को 14 फरवरी की सुबह एक गिफ्ट मिला, जिसमें किसी का नाम नहीं था। वह कुछ अजीब सा गिफ्ट था। गुमनाम गिफ्ट पाने के बाद लड़की उसे एक तरफ रख देती है, लेकिन शाम को वह गिफ्ट भेजने वाला उसके घर पहुँच जाता है और लड़की को अपने साथ चलने के लिए कहता है। जब वह मना करती है तो वह उससे कहता है कि आज वेलेंटाइन डे है और तुमने मेरा गिफ्ट स्वीकार किया है। इसलिए तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा। यह असभ्य तरीका ठीक नहीं है। वह लड़की तो समझदारी से संभल जाती है, लेकिन वर्तमान में अनेक युवा-युवतियाँ इस प्रणय निवेदन को अपनाकर कुछ ऐसे कदम उठा लेते हैं, जिसके बाद पछतावे के सिवा कुछ नहीं रह जाता।
खासकर हमारी संस्कृति में लड़का-लड़की अगर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध शादी करते हैं तो लोग यही कहते हैं कि लड़की भाग गई। उसका यूँ जाना ऐसा लगता है मानो उसने अनर्थ किया हो। जबकि सच यही है कि उसने वाकई अनर्थ किया है। उनके माता-पिता जिन्होंने 20-25 साल उसे प्यार किया और वह उन्हें धोखा देकर चली जाती है, जो मात्र कुछ दिनों से उसे चाहता है। आधी उम्र माता-पिता के साथ गुजारने के बाद बची आधी उम्र माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध गुजारना क्या उनके साथ न्याय है। क्या उनकी इच्छा, अपेक्षा और समाज में उनके हैसियत के साथ खिलवाड़ करना, उनके सम्मान को अपमानित करने जैसा नहीं है।
आज मीडिया कुछ कंपनियों के उत्पाद बेचने तथा उनकी पब्लिसिटी के लिए युवा को प्रणय निवेदन करने के तरह-तरह के प्रलोभन देता है। टिप्स बताता है। वहीं मोबाइल कंपनियाँ अपना कारोबार करने के लिए तरह-तरह की आकर्षक योजनाएँ चलाती हैं। अनेक प्रकार के आर्टिकल्स और लुभावने उदाहरण देकर युवा वर्ग को आकर्षित करते हैं। युवा इनसे भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें इनमें लिखे प्रेमी-प्रेमियों के किस्से अपने जैसे ही लगने लगते हैं। विभिन्न चैनल भी अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रायोजित करते हैं। केवल अपनी दुकान चलाने के लिए। ये सब समाज का कितना नुकसान करते हैं यह तो केवल समझने वाला ही समझ सकता है।


इन्द्रधनुष नहीं मेरा प्यार, जो सिर्फ सावन में खिले
मोती नहीं मोहब्बत मेरी, जो मिले गहरे पानी तले
चाँद भी नहीं प्यार मेरा, नजर आए बस साँझ ढले
मेरा प्यार है हवा सरीखा, जो हर पल तुम्हें स्पर्श करे.....
और................. तुम्हें पता भी चले