क्या निकल कर आएगा चिंतन शिविर से

Posted by Rajendra Rathore on 1:01 AM

देश की कानून व अर्थव्यवस्था लगातार बद्तर होती जा रही है। देश को बेहतर नेतृत्व प्रदान करने का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी हर मामलों में विफल हो चुकी है। लगातार बढ़ती महंगाई के बाद अब सिलेंडर का कोटा बढ़ाकर दर्द की दवा देने का दावा करने वाली केन्द्र सरकार ने वास्तव में डीजल के दाम नियंत्रणमुक्त कर लोगों का दर्द बढ़ाया ही है। बढ़ती महंगाई की मार झेल रही देश की जनता को कांग्रेस से कोई खास उम्मीद नहीं है, बावजूद इसके जयपुर में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर से क्या निकल कर आएगा, इस पर जरूर नजर है। देश की राजधानी दिल्ली में कुछ दिन पहले ही कई बड़ी वारदातें हुई, तब सरकार के तरफ से बयान आया कि सरकार चिंतित है। प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्रीगण देश की सुरक्षा को लेकर गहरें विचार में डूबे हुए हैं, लेकिन नतीजा क्या हुआ, यह सबके सामने है। इसे सरकार की कमजोरी और विफलता ही कहें कि पाकिस्तान ने दोस्ती का हाथ बढ़ाकर देश में आतंकवादी हमले कराए और भारत-पाक की सीमा पर तैनात जवान के सिर को धड़ से अलग कर दिया गया, फिर भी सरकार नरम रवैया अपनाती रही, लेकिन इस मामले से आक्रोशित भारतीय सेनाध्यक्ष ने जब पाकिस्तान को ललकारा, तब पाकिस्तान ने भारत से संधि करने का प्रस्ताव रखा। अगर, कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार वास्तव में देशहित को लेकर चिंतित है, तो इस तरह की घटना हुई कैसे, यह भी एक बड़ा सवाल है। मौजूदा हालात ऐसे है कि देश में आतंकवाद, नक्सलवाद व गंभीर किस्म के अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, इन विषयों पर चिंतन करने के बजाय देश की वरिष्ठ नेता श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित अन्य दिग्गज नेता आगामी चुनाव को लेकर चिंतन कर रहे हैं। इन नेताओं द्वारा इस मसले पर विचार नहीं किया जा रहा है कि देश से आतंकवाद, नक्सलवाद को आखिर खत्म कैसे किया जाए? इन्हें इस बात का दर्द भी नहीं है कि हाल ही में हुए आंतकवादी हमले में बाघा सीमा पर तैनात जवान मारे गए हैं, जिनके परिजनों के आंखों से आसू अब तक नहीं सूखे है। लिहाजा उनके घर पहुंचकर ढ़ाढस बांधे। शहीदों के परिजन सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता के भूखे नहीं हैं, क्या सरकार उन जवानों को वापस लौटा सकती है। यह संभव नहीं है, लेकिन भविष्य में होने वाली इस तरह की घटनाओं को चिंतन करके योजनाबद्ध तरीके से टाला जा सका है। मगर, कांग्रेस पार्टी का जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में शुक्रवार से शुरू हो रहा चिंतन शिविर देश के हालातों पर चिंतन करने के लिए नहीं, अपितु आगामी चुनाव को लेकर रणनीति तैयार करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है, इसमें कोई शक नहीं है। तभी तो कांग्रेस की चिंतन बैठक से पहले राहुल गांधी को पीएम बनाने की मांग मुखर हो रही है। कांग्रेस का यह चौथा चिंतन शिविर है और पहली बार चिंतन शिविर में इतनी तादाद में कांग्रेस के युवा नेता पहुंच रहे हैं, जिससे यह माना जा रहा है कि इस बार बुजुर्गो के चिंतन के बदले युवाओं का हल्लाबोल ज्यादा हो सकता है। वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के काल में दो चिंतन बैठकें हो चुकी हैं। पंचमढ़ी में कांग्रेस ने एकला चलो का नारा दिया था, तो शिमला में गठबंधन की खोज के सहारे सत्ता में पहुंचने की राह तलाशी गई थी। यह वह काल था, जब राजनीति के मंजे हुए कांग्रेस नेताओं पर सबकी नजर लगी थी। जयपुर से युवाओं की बढ़ी हुई भूमिका का संदेश जा सकता है। इस बैठक में युवा कांग्रेस के 54 और एनएसयूआइ के 45 सदस्य होंगे। इससे ऐसा लग रहा है कि अवसर देखकर कांग्रेस का युवा वर्ग युवाओं की भूमिका बढ़ाने का मामला उठा सकते हैं। यह आशंका भी है कि कुछ लोग वरिष्ठ नेताओं की ओर से युवाओं की राह में बिछाए जाने वाले अवरोध का जिक्र कर सकते है। चिंतन शिविर में पहुंचे उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा ने तो कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री बताया है। सीएम बहुगुणा का कहना है कि राहुल गांधी के अंदर पीएम बनने की सारी काबिलियत मौजूद है और अगला लोकसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। भले ही उनका यह तर्क अपने स्तर पर सही हो, लेकिन एक ही परिवार के लोगों को आमजनता अपने सिर पर रखकर कब तक ढ़ोते रहेंगे। भारत देश स्वतंत्र हो चुका है, लेकिन यहां रहने वाले लोग गुलामी की जंजीरों से अब तक जकड़े हुए हैं। आमजन पहले राजा-महाराजा की गुलामी करते रहे और अब कांग्रेस पार्टी की गुलामी करनी पड़ रही है। कांग्रेस पार्टी तो राजा-महाराजाओं के जमानें की तरह पीढ़ीवाद चला रही है, जिसका खामियाजां न चाहते हुए भी आमलोगों को भुगतना पड़ रहा है। सत्ता में नए चेहरों को आने से रोका जा रहा है, यह कहां तक उचित है। खैर, केन्द्र में कांग्रेस पार्टी जब से सत्तासीन हुई है, तब से विचार का ही दौर चल रहा है। अब देखना यह है कि जयपुर में आयोजित इस चिंतन शिविर से क्या निकल कर आता है। क्या वाकई में किसी विशेष पहलू पर विचार-विमर्श होगा या यह शिविर केवल चुनाव की तैयारियों तक ही सीमित रह जाएगा।