अमृत की खोज में लगी हुई है कांग्रेस

Posted by Rajendra Rathore on 12:17 AM

प्रयाग के महाकुंभ में करोड़ों श्रद्धालुओं का संगम हो रहा है। ऐसा माना जाता है कि संगम में डुबकी लगाकर जिंदगी को नई दिशाएं, नई प्रेरणा और नई ऊर्जा का अनुभव होता है, शायद इसी मकसद से कांग्रेस ने भी गुलाबी शहर जयपुर में अपनी दो पीढियों के संगम का विचार बनाया। कांग्रेस की युवा पीढ़ी और अनुभवी पीढ़ी का संगम जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में हो रहा है, लेकिन, ये शिविर सिर्फ संगम नहीं, समुद्र मंथन है। कांग्रेस अपने भविष्य के लिए खुद के समुद्र से मंथन कर अमृत की खोज में लग गई है। वर्ष 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली जीत के बाद नई दिल्ली में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भाजपा का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि भाजपा की चिंतन बैठक अब चिंता बैठकों में बदल गई हैं, आज कांग्रेस के हालात भी बहुत अच्छे दिखाई नहीं देते और हो सकता है कि इसी वजह से कांग्रेस को चिंतन शिविर की याद आई हो। 40 साल में कांग्रेस का ये चौथा चिंतन यज्ञ हो रहा है। पहला चिंतन शिविर 1974 में, दूसरा 1998 में और तीसरा 2003 में शिमला में आयोजित किया गया था। पिछले चिंतन शिविर में कांग्रेस ने ‘एकला चलो रे’ का फैसला लिया। राजनीतिक तौर पर यह नारा काम नहीं आया और 6 साल तक कांग्रेस को इंतजार करना पड़ा। अपनी खस्ता हालत और राजनीतिक अनुभवों का फायदा उठाते हुए सोनिया गांधी ने खुद के नेतृत्व में लिए हुए फैसले को ही बदलने में भलाई समझी और एकला चलो रे से कांग्रेस सबको साथ लेकर चलने को तैयार हो गई, जिसका उसे फायदा भी हुआ कि 19 दलों के गठबंधन यूपीए को उस वक्त सरकार बनाने का मौका मिल गया, जबकि हर कोई एनडीए सरकार की वापसी की बात कर रहा था। शिमला से जयपुर तक आने में कांग्रेस को 9 साल लग गए, तो क्या ये कांग्रेस की चिंता का नतीजा तो नहीं कि इस बार कांग्रेस को लगने लगा है कि अगला आम चुनाव पार्टी के लिए आसान नहीं है। 2009 के चुनावों के वक्त कांग्रेस आश्वस्त सी थी कि उसे फिर मौका मिलने वाला है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 2010 में ऐलान भी किया था कि पार्टी जल्द से जल्द चिंतन शिविर का आयोजन करेगी, ताकि मंथन से पार्टी का रूप निखर सके। कांग्रेस को अब अगले चुनाव के लिए नए चेहरे की जरूरत समझ आने लगी है। कांग्रेस नेताओं की बात मानें तो ये तय सा है कि कांग्रेस अगला आम चुनाव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लड़ने नहीं जा रही है। वैसे भी यूपीए 2 के कार्यकाल के दौरान कांग्रेसी नेताओं ने अपनी नौकरी और हाजिरी पक्की करने के लिए हजारों बार राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की मांग की है। राहुल प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं या नहीं या वो सोनिया की तरह किसी और को खड़ाऊं सौंपना चाहते हैं, यह खुद राहुल ही जानते हैं, लेकिन इससे भी अहम है कि क्या अगले चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनने वाली है या बेवजह ही कर्ण बनने के बहाने बनने लगे हैं। कांग्रेस के इस शिविर में युवराज राहुल गांधी को राजपाट सौंपे जाने की मांग सार्वजनिक तौर पर हो जाए, इसका इंतजाम कर दिया गया है। चिंतन शिविर में आने वाले साढ़े तीन सौ नेताओं में से 160 युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के नेता हैं। पहली बार चिंतन शिविर में इतनी बड़ी हिस्सेदारी युवाओं की हो रही है, इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि देश का करीब दो तिहाई वोटर इस वक्त नौजवान है और नौजवानों का गुस्सा कांग्रेस की सरकार ने हाल में देखा ही है। लेकिन, क्या उस सवाल का जवाब मिल गया है कि जब दिल्ली गैंगरेप की घटना से आक्रोशित हिंदुस्तान का नौजवान कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहा था, तब युवा हृदय सम्राट राहुल गांधी कहां थे, उन्होंने उस पीडित को न्याय दिलाने के लिए क्या किया? संसद में 9 बरस तक राहुल ने नौजवानों के लिए क्या किया? कौन से अहम् मुद्दे उठाए? यूपी के चुनावों में मुट्ठी बांधकर भाषण देने वाले राहुल को कब किस और बात पर गुस्सा आया? अब सवाल है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव में उतरना चाहती है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी की इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि राहुल की ताजपोशी की बात बेमानी है, वो तो पार्टी में सोनिया गांधी के बाद दूसरे नंबर के नेता हैं ही। लेकिन, क्या कांग्रेस राहुल गांधी को भाजपा के वरिष्ठ व कद्दावर नेता नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतारने के लिए तैयार है, जिनका सामना राहुल ने गुजरात में नहीं किया। राहुल से ज्यादा इस बात पर मंथन करने की जरूरत है कि क्या कांग्रेस अपने क्षेत्रीय नेताओं को ताकतवर बनाना चाहती है, क्या पार्टी उनकी बात सुनने को तैयार है? वर्तमान वर्ष में देश के 9 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और यदि वो अपने क्षत्रपों को ताकत दे, तो शायद हालात बेहतर हो सकते हैं, क्या उसके पास मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुकाबले, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के, गुजरात में नरेन्द्र मोदी के या फिर ओडिसा में नवीन पटनायक, बिहार में नीतीश कुमार के और तमिलनाडु में जयललिता या करूणानिधि के मुकाबले कोई क्षेत्रीय नेता है। कांग्रेस में इंदिरा गांधी के जमाने से क्षेत्रीय नेताओं को खिलौना समझने की आदत रही है और केन्द्रीय नेतृत्व अपने मन और मूड के हिसाब से उनके साथ खेलता रहा है। चिंतन शिविर का मकसद मेडिटेशन है यानी खुद के भीतर झांकना और शीशे को साफ कर अपने को पहचानना। अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि बाहर की लड़ाई लड़ना आसान होता है, लेकिन अंदर की कमजोरियों को दूर करने के लिए पहले कुछ कड़े फैसले करने होते हैं, वो भले ही पसंद ना हों, मगर उन्हें अपनाना होता है। समुद्र मंथन में अमृत के लिए तो सभी लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन जो विष को स्वीकार करता है, वो देवों का देव महादेव कहलाता है। क्या कांग्रेस ऐसे में नीलकंठ बनने को तैयार है?