जांजगीर-चांपा जिले में भी सिंगूर जैसे ही हालात

Posted by Rajendra Rathore on 12:31 AM

-राजेंद्र राठौड़@छत्तीसगढ़ सर्वोच्च न्यायालय का पश्चिम बंगाल की सिंगूर परियोजना पर ऐतिहासिक फैसला विस्थापितों के संघर्ष की बड़ी जीत है। सिंगूर की तरह जिले में भी हालात अच्छे नहीं है। राज्य सरकार ने यहां तीन दर्जन परियोजनाओं और औद्योगिक समूहों के लिए किसान व ग्रामीणों की हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहित की है। प्रभावित किसान और ग्रामीणों के साथ विस्थापन से लेकर मुआवजे तक कई बार दगा हुआ है। कई परियोजनाओं की जमीनें अब तक उपयोग नहीं की गई है। इतना ही नहीं, जिले के कई इलाकों में उद्योगपतियों को उपकृत करने जमीनें छीनी गई हैं। ऐसे मजबूर किसान व ग्रामीण जमीन से दर-बदर होकर आंदोलन के सहारे अपना वाजिब हक मांगने अरसे से जूझ रहे है, लेकिन न तो राज्य सरकार उनकी सुन रही है और न ही उन्हें केन्द्र सरकार से राहत मिल रही है। इस स्थिति में विस्थापितों को अब न्यायालय ही बेहतर विकल्प नज़र आ रहा है। रमन सरकार द्वारा कई नामी कंपनियों से एमओयू करने के बाद जांजगीर-चांपा जिले में औद्योगिक संयंत्रों के विस्तार से विकास को गति जरुर मिल रही है, लेकिन संबंधित परियोजनाओं से प्रभावित हुए लोगों को उनका जायज हक नहीं मिल पा रहा है। प्रशासन से मिले आंकड़े के मुताबिक, दो दर्जन संयंत्रों के लिए 2350.836 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है, इसमें से 1656.769 हेक्टेयर निजी भूमि है। शेष शासकीय भूमि संयंत्रों को लीज पर मिली है। वर्तमान में केएसके महानदी, डीबी पॉवर, मड़वा प्रोजेक्ट, पीआईएल, लाफार्ज सहित आधा दर्जन संयंत्र संचालित हैं। कई संयंत्रों की स्थापना का कार्य चल रहा है। संयंत्र स्थापना के लिए प्रबंधन किसी भी हद को पार कर दे रहे हैं। पावर कंपनियों के खिलाफ भू-विस्थापित लामबंद हो समय-समय पर आंदोलन भी कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अब तक बेहतर नहीं निकल पाया है। ग्राम गोधना के हरिराम पिता महारथी साहू के नाम पर शामिल खाते में कुल 9 एकड़ कृषि भूमि थी, लेकिन अब सिर्फ 2 एकड़ भूमि ही बची है। हरिराम बताते हैं कि कर्नाटका पॉवर कंपनी लिमिटेड ने उद्योग लगाने के लिए उनकी 7 एकड़ भूमि अधिग्रहित की, जिसमें से करीब एक एकड़ भूमि का मुआवजा अब तक नहीं मिला है। वे आगे बताते हैं कि उनके परिवार में कुल 15 सदस्य हैं, जिनका 2 एकड़ कृषि भूमि से पालन पोषण कर पाना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा कंपनी प्रबंधन ने रोजगार देने के वादे भी किए थे, लेकिन उद्योग का अब तक कहीं अता-पता नहीं है। इसलिए रोजगार के लाले भी पड़ गए हैं। ग्राम गोधना के शत्रुहन लाल साहू पेशे से मजदूर हैं। गांव में इनके नाम पर करीब एक एकड़ कृषि भूमि थी, जिसमें से 82 डिसमिल भूमि कर्नाटका पॉवर कंपनी लिमिटेड ने अधिग्रहित कर ली है। शत्रुहन ने बताया कि भूमि के बदले उन्हें मुआवजा राशि तो दी गई, लेकिन प्लांट शुरू नहीं होने की वजह से रोजगार नहीं मिला। वे बताते हैं कि पहले खेती-बाड़ी व मजदूरी करके वे किसी तरह जीवन-यापन कर लेते थे, लेकिन अब परिवार पालना मुश्किल हो गया है। मुआवजा बतौर मिली राशि कई कामों में खर्च हो चुकी है। अब रोजगार की सबसे बड़ी समस्या है। हाथ खाली हो गए हैं और रोजगार के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। ग्राम गोधना के गोविंदराम साहू के घर कुल 19 सदस्य हैं। गोविंद के तीनों पुत्रों की शादी हो गई है। वे बताते हैं कि कुछ साल पहले तक खेती-बाड़ी करके गुजारा हो जाता था, लेकिन केपीसीएल के लिए कृषि भूमि अधिग्रहित होने के बाद अब पेट पालना मुश्किल हो गया है। उनके पास अब थोड़ी कृषि भूमि ही बची है, जिसमें धान का उत्पादन कर किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कृषि भूमि पॉवर कंपनी के पास बिकने के कारण उनके दो पुत्रों को मजदूरी के लिए रायगढ़ जिले में जाना पड़ा है। एक पुत्र गांव में ही रहकर मजदूरी कर रहा है। कंपनी ने जमीन लेते समय कई वादे किए थे, लेकिन उन वायदों का अब तक कुछ पता नहीं है। केपीसीएल से प्रभावित रतिराम साहू व उनके परिवार के समक्ष अब जीवकोपार्जन की सबसे बड़ी समस्या है। ग्राम गोधना निवासी रतिराम का कहना है कि कंपनी ने उनसे 99 डिसमिल भूमि ली है। मुआवजा तो तीन साल पहले ही मिल गया है, लेकिन अन्य सुविधाएं नहीं मिल रही है। वे बताते हैं कि जिस वक्त उनसे जमीन ली गई, तब कंपनी के अफसरों ने प्लांट में स्थायी नौकरी तथा अन्य सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया था। कंपनी के अफसर जमीन खरीदने के बाद अब गांव में नजर ही नहीं आते। भूमि बिकने के बाद हो रही समस्याओं को लेकर कई बार शासन-प्रशासन तक गुहार लगाई गई, लेकिन सभी से कोरा आश्वासन ही मिला। ग्राम गोधना निवासी मदनलाल साहू कृषक हैं। वे बताते हैं कि केपीसीएल के लिए उनकी कुल 53 डिसमिल भूमि अधिग्रहित की गई। कंपनी प्रबंधन ने 13 डिसमिल भूमि का मुआवजा तीन साल पहले 13 लाख 80 हजार रुपए एकड़ की दर से दिया, लेकिन शेष 40 डिसमिल भूमि का मुआवजा अब तक नहीं मिला है। मुआवजे के लिए कंपनी के अफसर घुमा रहे हैं। इसकी शिकायत एसडीएम, कलक्टर से लेकर कई उच्चाधिकारी व जनप्रतिनिधियों से की जा चुकी है, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया है। भूमि खरीदते समय पॉवर कंपनियों ने नियम-कायदों का गंभीरता से पालन करने की दुहाई दी थी, लेकिन अधिकांश कंपनी फिसड्डी साबित हुए। केपीसीएल हो या केएसके महानदी पॉवर कंपनी लिमिटेड, अथेना, डीबी पॉवर या फिर आरकेएम पॉवर। केपीसीएल ने प्रभावितों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के दावे किए थे, लेकिन अब कंपनी उन वायदों से मुकर रही है। प्रबंधन से जुड़े अफसरों का कहना है कि प्लांट ही स्थापित नहीं हो पाया है तो सुविधाएं आखिर कैसे दे पाएंगे। डभरा क्षेत्र में स्थापित आरकेएम पॉवर ने जहां आदिवासियों की जमीन फर्जी तरीके से खरीदकर उन्हें भूमिहीन बना दिया है तो वहीं डीबी पॉवर पर भी फर्जी तरीके से आदिवासी भूमि खरीदे जाने की कई शिकायतें लंबित है। जिले में भूअर्जन के दौरान राज्य सरकार तथा जिला प्रशासन की भूमिका उद्योगों के पक्ष में ही रही है। इसके कई बड़े उदाहरण हैं, जिसमें सरकार ने उद्योगपतियों से सांठगांठ कर नियमों की खुलकर धज्जियां उड़ाई हैं। केएसके महानदी को बांध बेचे जाने का मामला, डीबी पॉवर व आरकेएम पॉवर द्वारा खुलेआम आदिवासी भूमि खरीदे जाने का मामला, ग्रीन बेल्ट के लिए मिली सरकारी जमीन पर आरकेएम पॉवर द्वारा पेट्रोल पंप लगाए जाने का मामला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। ये सभी फर्जीवाड़े जिला प्रशासन व राज्य सरकार की आंखों के सामने ही खुलकर हुए, लेकिन शासन-प्रशासन ने हस्तक्षेप करने के बजाय मामले को किसी तरह निपटाकर उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का काम किया। अकलतरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम नरियरा में केएसके महानदी पॉवर कंपनी को राज्य शासन ने बांध को ही बेच दिया। बांध सिंचाई विभाग का था, जिसे आसपास की सिंचाई के लिए करीब 50 साल पहले बनवाई गई थी। सिंचाई विभाग ने इस बांध को अनुपयोगी बताया था, जबकि क्षेत्र के किसानों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट किया था कि उस बांध से सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई होती है। दिलचस्प बात यह भी है कि जिस समय रोगदा बांध बना, उसमें कई किसानों की भूमि गई थी। बांध बनने से वर्ष 2012 तक बांध के दायरे में आई जमीन राजस्व रिकार्ड में किसानों के नाम पर ही दर्ज थी। 46 सालों से उस जमीन का नामांतरण नहीं हुआ था, लेकिन केएसके महानदी पॉवर कंपनी लिमिटेड को जब बांध व उसके आसपास की भूमि देने की बात आई तो जिला प्रशासन ने सरकार के इशारे में रातों-रात जमीन का नामांतरण करा दिया। इसी तरह जिले के बलौदा विकासखंड अंतर्गत ग्राम मड़वा-तेंदूभाठा में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी 500-500 मेगावाट की दो यूनिट स्थापित कर रही है। पावर प्लांट व रेल लाइन विस्तार के लिए ग्राम मड़वा, तेंदूभाठा सहित 17 गांवों की कृषि व शासकीय भूमि उपयोग में लाई गई है। कंपनी द्वारा उपयोग में लाई गई भूमि को लेकर एक बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है। केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एमओयू की शर्तो के तहत् छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी को मड़वा प्रोजेक्ट के लिए कुल 508 हेक्टेयर कृषि व शासकीय भूमि उपयोग में लाने की अनुमति दी थी। करार में स्पष्ट किया गया था कि जिन किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहित की जाएगी, उसके एवज में संबंधित भू-विस्थापितों को पुनर्वास नीति के तहत् जरूरी सुविधाएं दी जानी है, लेकिन मड़वा-तेंदूभाठा प्रोजेक्ट ने इस शर्त का पहले ही उल्लंघन कर किया है। पॉवर कंपनी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को गुमराह करते हुए प्रोजेक्ट विस्तार के लिए 508 हेक्टेयर भूमि की जगह 650 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि उपयोग में लाई है। इसमें कृषि व शासकीय भूमि दोनों समाहित है, जबकि इसकी सूचना पर्यावरण व वन मंत्रालय को नहीं दी गई है। पॉवर कंपनी ने इतनी भूमि में अपने प्रोजेक्ट का विस्तार सहित आवासीय परिसर, रेल लाइन विस्तार व अन्य कार्य कराया है। अनुमति से अधिक भूमि उपयोग में लाए जाने संबंधी यह मामला पिछले दो सालों से दबा हुआ था, लेकिन कुछ माह पहले मामले की शिकायत कुछ भू-विस्थापितों ने छत्तीसगढ़ शासन सहित केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में की, तब इस बात का खुलासा हुआ। बताया जाता है कि प्रारंभिक जांच में शिकायत सही पाई गई है और पॉवर कंपनी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की शर्ताे का उल्लंघन करते हुए 508 हेक्टेयर की जगह 650 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया है। मामले में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय कई बार नोटिस जारी कर चुका है, लेकिन पॉवर कंपनी से किसी तरह का जवाब अब तक नहीं मिला है। जिले के डभरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम उच्चपिंडा में निर्माणाधीन आरकेएम पावरजेन की गड़बडिय़ों के खुलासे एक-एक करके सामने आ रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, नहर, बांध व निस्तारी तालाबों पर कब्जा करने वाली इस कंपनी का एक बड़ा गड़बड़झाला उजागर हुआ है। आरकेएम पावरजेन के तत्कालीन महाप्रबंधक जी परमजोती ने वर्ष 2008 में ग्राम बांधापाली, घिवरा, कानाकोट, उच्चपिंडा आदि गांवों की शासकीय भूमि पर पौधरोपण की अनुमति के लिए तहसील न्यायालय डभरा में आवेदन प्रस्तुत किया था। कंपनी के प्रबंधक ने छग भू-राजस्व संहिता की धारा 239 के तहत इन गांवों की करीब 150 एकड़ भूमि की आवश्यकता बताई थी। भू-आवंटन के लिए प्रस्तुत किए गए आवेदन के साथ कंपनी प्रबंधन ने चाही गई भूमि का खसरा नंबर एवं नक्शा की सत्य प्रतिलिपी प्रस्तुत की थी। नियमानुसार, ग्रीन बेल्ट के लिए भू-आवंटन का अधिकार तहसील न्यायालय को नहीं था। बावजूद इसके तत्कालीन तहसीलदार केएल सोरी ने वर्ष 2008-09 में ग्राम घिवरा की 29.25 एकड़, ग्राम कानाकोट की 3.39 एकड़, उच्चपिंडा की 61.43, बांधापाली की 103.76 सहित कुल 197.84 एकड़ जमीन पौधरोपण के लिए आरकेएम पावरजेन कंपनी लिमिटेड को आवंटित कर दी। शासकीय भूमि आवंटित होने के बाद कंपनी प्रबंधन ने उस जमीन पर ग्रीन लैंड तो विकसित नहीं किया, लेकिन भू-आवंटन के कुछ माह बाद बांधापाली की भूमि में पेट्रोल पंप खोल दिया। वहीं शेष भूमि का उपयोग आवासीय परिसर, दफ्तर व अन्य कार्यों के लिए किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे गड़बड़झाले को कंपनी प्रबंधन ने जिला प्रशासन की आंखों के सामने अंजाम दिया है। इसके बावजूद जिला प्रशासन ने ग्रीन लैंड के लिए आवंटित भूमि की उपयोगिता की छानबीन कराना भी जरूरी नहीं समझा।