आत्महत्या को मजबूर ‘‘अन्नदाता’’

Posted by Rajendra Rathore on 10:02 PM

देश की अधिकांश आबादी कृषि कार्य पर निर्भर है और इस कृषि के काम को करने वाला टाटा या अम्बानी जैसे उद्योगपति नहीं बल्कि, एक आम किसान है, जो दिन रात एक करके फसल को तैयार करता है, उसे आज सरकारी मदद के आभाव में कर्ज के बोझ ले दबकर आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उपेक्षा कर्जदारी की वजह से अन्नदाता आत्महत्या कर रहे हैं तो सोचा जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है।
देश में पिछले एक साल में 14 हजा 4 किसानों ने उपेक्षा, अभाव और कर्जदारी की वजह से आत्महत्या क ली है। प्रत्येक 12 घंटों में देश के किसी न किसी हिस्से में भूमि-पुत्र आत्महत्या कर रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों को देखें तो 1995 के बाद से लेकर अब तक 2 लाख 70 हजार भूमिपुत्रों ने आत्महत्या है। जबकि कृषि संबंधित मामलों के जानकार मानते हैं कि ये आंकड़े ज्यादा भी हो सकते हैं, क्योंकि इस तरह की आत्महत्याओं का सही ढंग से आंकलन नहीं किया जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि देश में पिछले साल हुई कुल आत्महत्याओं की संख्या 1 लाख 35 हजार में से 10 फीसदी मौतें किसानों की हुई हैं। ये वो आंकड़े हैं जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं। इनमें वो आंकड़े शामिल नहीं है, जिनका संज्ञान पुलिस नहीं लेती या फिर जिनको लेकर राज्य सरकारों के पास बहानों की पूरी फेहरिस्त है। महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक के बाद सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले छत्तीसगढ़ में सामने आए हैं। सबसे बुरी स्थिति महाराष्ट्र की है जहाँ पिछले साल 3 हजार 337 किसानों ने आत्महत्या की है। वर्ष 2010 में महाराष्ट्र में 3 हजार 141 किसानों ने आत्महत्या की थी। महाराष्ट्र के अलावा अन्य जिन प्रदेशों में मौत के आंकड़ों में वृद्धि हुई है, उनमें मध्य प्रदेश, गुजरात ,तमिलनाडु और हरियाणा शामिल हैं। आश्चर्यजनक बात है कि खुद केन्द्रीय मंत्री शरद पवार एनसीआरबी के इन आकड़ों को मानने से इनकार करते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के आने से ठीक पूर्व पिछले एक सप्ताह के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में लगभग दो दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है, इनमें सर्वाधिक 6 मौते विदर्भ में हुई हैं। इनके अलावा उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु से किसानों के आत्महत्या किए जाने की खबरें मिल रही हैं। कर्ज माफी के तमाम दावों के बावजूद मध्यप्रदेश में किसानों की मौत का आंकड़ा 1 हजार 113 से बढ़कर 1 हजार 326 हो गया है। खेती की समस्या से जूझते इन राज्यों के अलावा सबसे चौकाने वाले तथ्य असम जैसे पूर्वोतर राज्य से सामने आए हैं, जहां 2010 में 269 किसानों ने आत्महत्या की थी, जो 2011 में बढकर 312 तक पहुंच गई है। मौत के आंकड़े उन विभिन्न पैकेजों की भी पोल खोलती हैं, जिनकी घोषणा केन्द्र व राज्य सरकारें करती हैं।
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल हुई मौतों की संख्या साल 2010 में हुई 15 हजार 933 मौत की अपेक्षा कम है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि राज्य सरकारों ने हर वर्ष बढ़ती जा रही किसानों की आत्महत्या को स्वीकार न करने की ठान ली है। किसानों की आत्महत्या को लेकर छत्तीसगढ़ शासन के पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों का कहना है कि प्रदेश में अब तक एक भी किसान ने कृषि संबंधित परेशानी के कारण आत्महत्या नहीं की है, जबकि राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने ग्रामीण इलाकों में हुई आत्महत्याओं को किसानों की आत्महत्या मान लिया गया है। वहीं ओडिशा के कृषि मंत्री प्रदीप महारथी अपने राज्य में होनी वाली मौतों के पीछे किसानों की बदहाल स्थिति को जिम्मेदार न मानते हुए कहते हैं कि किसान लोन लेकर जुए खेल जाते हैं और जब चुका नहीं पाते तो आत्महत्या कर लेते हैं। पश्चिम बंगाल के गरीब, बदहाल किसानों की मौत वहाँ के कृषि सचिव को दारूबाजी की परिणिति लगती है। एनसीआरबी के आंकड़ों के सामने आने के बाद भी गुजरात सरकार ने आश्चर्यजनक ढंग से कहा है कि हमारे यहाँ एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है, जबकि ये आंकड़े राज्य सरकार ने ही एनसीआरबी को भेजी थी। मेरा मानना है कि पुलिस की ओर से थाना स्तर पर जिस तरह आत्महत्याओं के मामले निपटाए जाते है, उससे उनके वास्तविक कारणों का पता नहीं चल पाता है। क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के यह आंकड़े राज्य की पुलिस की ओर से ही भेजे जाते हैं। मगर ये कहीं नहीं बताया जाता है कि आत्महत्या करने वाले ने आर्थिक कारणों से ऐसा किया है। गंभीर बात यह है कि अधिकतर मामलों में पुलिस अन्य कारणों का उल्लेख करते हुए मामले का निपटारा कर देती है। किसानों की आत्महत्या का एक सबसे बड़ा कारण आर्थिक तंगी ही है। जबसे किसानों की आत्महत्या के मामले उजागर होने लगे हैं, तबसे पुलिस ने किसानी की वजह से आत्महत्या के खाने को एक तरह से हटा ही दिया है। उसकी जगह पर अब अज्ञात कारणों से आत्महत्या लिखना सरल और सहज समझा जाने लगा है।
आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को सरकार मुआवजा न देने के सौ बहाने बनाती है। अगर जमीन बाप के नाम पर है और सारा काम बेटा करता है और भूखमरी के हालत में आत्महत्या कर लेता है तो सरकार उस किसान की आत्महत्या को गणना में नहीं लेती है, क्योंकि खेती की भूमि उसके नाम न होकर उसके बूढ़े बाप के नाम है। फिर सरकार कहती है कि इस हालत में किसान के बेटे ने कर्ज से उत्पन्न समस्याओं के कारण आत्महत्या नहीं की। परिवार का बड़ा लड़का बाप के बूढ़े होने के कारण खेती का काम तो संभाल लेता है, परंतु उसको यह कभी विचार नहीं आ सकता कि बाप के होते हुए भूमि अपने नाम करवा ले। पिछले दो दशक में किसानों के हालात बुरे हुए हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ हर साल बढ़ती जा रही है। कृषि प्रधान देश में आज ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं कि किसान अपने आप को हर तरफ से असहाय महसूस कर रहा है। किसानों के आत्मह्त्या की वजह केवल एक ही कारण से हो रही है, ये कहना थोड़ा सा अनुचित होगा, मगर इसकी सबसे शक्तिशाली वजह किसानो का कर्ज में डूबा होना ही रहा है। ये कर्ज कभी सरकार का होता है और कभी साहूकार का, और जब किसान को ऐसा लगने लगता है कि वह अब कर्ज को नहीं चुका पाएगा और उसे समाज में भारी अपमान सहना पड़ेगा तो उसे सबसे आसान रास्ता आत्महत्या ही नजर आता है। उसे उस समय यह बिल्कुल समझ नहीं आता है कि वह क्या करे और घबराहट में वह आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा देता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि फसल तो बहुत अच्छी होती है, लेकिन उस फसल को बेचने के बाद उसे उसका भुगतान इतने दिनों बाद मिलता है को वह कर्ज कई गुना हो चुका होता है और मासूम किसान उसे चुकाने में खुद को असमर्थ पाता है। वर्तमान स्थिति में अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो जो किसान आज पूरे देश के लिए अन्न पैदा कर रहा है वो अनाज सिर्फ अपने लिए ही पैदा करेगा और उसके बाद जो स्थिति होगी उसके बारे में सोचा भी नही जा सकता।