एक दिन सम्मान, साल भर अपमान !

Posted by Rajendra Rathore on 11:02 PM


(5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष)

भारत देश में शिक्षक दिवस के मौके पर केन्द्र व राज्य सरकारें बेहतर अध्यापन के लिए कई शिक्षकों का सम्मान करती है, ताकि शिक्षक और भी अच्छे ढंग से बच्चों को ज्ञान प्रदान कर सकें, लेकिन दुर्भाय है कि उस सम्मान को पाने के लिए शिक्षकों को खुद ही अपना आवेदन देना पड़ता है। शिक्षक दिवस पर मिलने वाले राष्ट्रपति और राज्यपाल सम्मान के लिए उच्चाधिकारियों के समक्ष अपनी उपलब्लियां गिनवाना शिक्षकों की मजबूरी बन गई है। अच्छे शिक्षक होने के बावजूद सोर्स के बिना सम्मानित हो पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। शिक्षक पूरी ईमानदारी और निष्ठा से बच्चों को पढ़ाते है, लेकिन महज एक दिन ही उनका सम्मान होता है, जबकि साल भर उन्हें कई अपमान सहने पड़ते हैं।
‘शिक्षक दिवस’ कहने-सुनने में तो बहुत अच्छा प्रतीत होता है, लेकिन इसके महत्त्व को अधिकांश लोग नहीं समझते हैं। शिक्षक दिवस का मतलब साल में एक दिन बच्चों के द्वारा अपने शिक्षक को भेंट में दिया गया एक गुलाब का फूल या कोई भी उपहार नहीं है और यह शिक्षक दिवस मनाने का सही तरीका भी नहीं है। वास्तव में शिक्षक दिवस मानने का मू मकसद शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरुकता लाना है। इस कार्य को बेहतर ढंग से निष्पादित करने वाले शिक्षकों को भारत देश में हर वर्ष शिक्षक दिवस के मौके पर राष्ट्रपति व राज्यपाल सहित विभिन्न पुरस्कारों से सम्मान किया जाता है। ऐसे में हर साल शिक्षक दिवस आते ही सम्मान पाने के लिए शिक्षकों में उम्मीदें जाग जाती हैं। खासकर, भारत देश में सम्मान के लिए शिक्षकों को खुद ही अपनी उपलब्धियांे की कुंडली बनाकर विभागीय अधिकारियों को सौंपनी पड़ती है। शासन अपने अधिकारियों की नजरों को योग्य-अयोग्य शिक्षका का चयन करने के काबिल नहीं मानता, शायद इसीलिए शिक्षकों को उपलब्धियां गिनवाकर सम्मान की दौड़ में शामिल होना पड़ता है, जिससे वह सम्मान किसी अपमान से कम नहीं लगता। कई बार शिक्षक की छोटी-मोटी गलती होने पर अधिकारी उन पर तुरंत कार्रवाई कर देते हैं, इसके अलावा, घर-घर जाकर जनगणना, मलेरिया, कुष्ट और अन्य बीमारियों के रोगियों को खोजने की जिम्मेदारी भी शिक्षकों के कंधे डाल दी जाती है। क्या वास्तव में शिक्षकों की नियुक्ति इन्ही कार्यो के लिए हुई है, या सरकार ने उन्हें स्कूल में पढ़ाने के लिए नौकरी दी है। वर्तमान में सरकार ने कई श्रेणियां बनाकर भी शिक्षकों के सम्मान के साथ कुठाराघात किया है। शिक्षाकर्मी, सहायक शिक्षक, संविदा शिक्षक, प्रेरक सहित और भी कई श्रेणियां है, जिसके कारण शिक्षा का स्तर दिनों दिन गिरता जा रहा है, इस बात की चिंता सरकार को तनिक भी नहीं है। इसके बावजूद कई शिक्षक ईमानदारी से काम कर रहे हैं, लेकिन अच्छे काम करने वाले शिक्षक को प्रोत्साहन के नाम पर कुछ नहीं मिलता है। शिक्षक दिवस के मौके पर मिलने वाले राष्ट्रपति व राज्यपाल पुरस्कार के लिए जिला शिक्षा अधिकारी अपनी ओर से भी कोई प्रयास नहीं करते, जबकि वे अच्छे और ईमानदार शिक्षक को भीलि भांति जानते है और उनकी काबिलियत को अच्छी तरह से आंक सकते हैं। यही वजह है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल पुरस्कार के लिए अपात्र शिक्षक दावेदारी करने से पीछे नहीं हटते। कई बार फर्जी कागज व मात्र दिखावे के लिए फोटो आदि के साथ उपलब्धियां गिनाई जाती है, इसे अधिकारी भी स्वीकार करते हैं। मगर शासकीय प्रक्रिया होने के कारण कोई खिलाफत भी नहीं करना चाहता। पुरस्कार के लिए अपात्र शिक्षकों द्वारा मंत्री, विधायक, व कई उच्च अधिकारियों से भी सिफारिश कराया जाता है। वहीं जिसकी जितनी अच्छी फाइल तैयार हुई होगी, वे शिक्षक सम्मान के हकदार होंगे। शैक्षणिक योग्यता के साथ 5 वर्षो का परीक्षा परिणाम और इस दौरान प्राप्त उपलब्धियों का ब्यौरा भी देना होता है। नेताओं, मंत्री और अधिकारियों के साथ कार्यक्रमों के अपने जितने अधिक फोटो को जो शिक्षक आवेदन के साथ लगाते है, उनकी दावेदारी उतनी ही सशक्त मानी जाती है। यही नहीं किसी ख्यातिप्राप्त व्यक्ति से अपने बारे में अच्छी पंक्तियां भी लिखवानी पड़ती है, इसके साथ ही सात-आठ हजार रूपए खर्च भी करने पड़ते हैं। एक तरह से शिक्षक सम्मान का यही अर्थ निकल रहा है कि जो शिक्षक साल भर स्कूल नहीं पहुंचते, वही राष्ट्रपति व राज्यपाल पुरस्कार के हकदार बन जाते हैं। ऐसे में देश के भविष्य कहलाने वाले बच्चों का आखिर भविष्य क्या होगा, इसके बारे में सरकार के साथ ही आमलोगों को गहराई से विचार करना चाहिए, तभी डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का औचित्य होगा।