नीयत में खोट, गरीबों पर चोंट

Posted by Rajendra Rathore on 10:54 AM

सुप्रीम कोर्ट के फटकार के बाद उत्तरप्रदेश की मायावती सरकार ने अपनी नई भूमि अधिग्रहण नीति भले ही जारी कर दी है, लेकिन ग्रेटर नोएडा में सरकार ने जो कुछ किया, उससे जाहिर होता है कि सरकार की नीयत में खोट था। यदि ऐसा नहीं था तो औद्योगिक विकास के नाम पर न तो गरीबों का दमन किया जाता और न ही जमीन अधिग्रहण के महज 11 दिनों के भीतर ही कानून में व्यापक पैमाने पर बदलाव होता। वर्तमान में जमीन अधिग्रहण के मामले में यह स्थिति उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। तेज विकास और निवेश के नाम पर देश के कई राज्यों में जमीनों का अधिग्रहण हो रहा है और विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए भूमि अधिग्रहण का मामला यहां राजनीतिक रंग लेता जा रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने ग्रेटर नोएडा में 156 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण रद्द करने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने के साथ ही कई गंभीर सवाल उठाए हैं, साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार भी लगाई है। सर्वोच्च न्यायालय के फटकार के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने भूमि अधिग्रहण की नई पालिसी घोषित की है, जिसके मुताबिक भूमि अधिग्रहण को तीन श्रेणियों में रखा गया है। पहली श्रेणी में हाईवे तथा नहर जैसे सरकारी कार्य हैं। इनके लिए पूर्ववत भूमि अधिग्रहण जारी रहेगा। दूसरी श्रेणी में सरकारी निगम रखे गए हैं, जो कि नियोजित ढंग से विकास का प्लान बनाते हैं। इनके द्वारा भी पूर्ववत भूमि अधिग्रहण जारी रहेगा, लेकिन अब किसानों को विकसित भूमि का 16 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त मिलेगा। वहीं तीसरी श्रेणी में मुख्य वाणिज्यिक कार्य रखे गए हैं, जिनमें एक्सप्रेसवे व स्पेशल इकोनोमिक जोन शामिल है। इनके लिए कंपनी को भूमि सीधे किसानों से खरीदनी होगी। इसके अलावा 70 फीसदी भूमि सीधे क्रय करने के बाद शेष 30 प्रतिशत का अधिग्रहण निजी कंपनी के लिए किया जा सकता है। उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण की नई पालिसी बदलने से पहले ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण ने औद्योगिक विकास के नाम पर जमीनें जिस तरह बड़े बिल्डरों के हवाले कर दी थीं, उससे पता चलता है कि राजधानी दिल्ली के आसपास बन रहे उपनगरों में कैसा खेल चल रहा है। निःसंदेह इसके पीछे बढ़ती आबादी का दबाव है, लेकिन ये बिल्डर जिस तरह के फ्लैट और कालोनियां बना रहे हैं, वे उन किसानों की पहुंच से बहुत दूर हैं, जिनकी जमीनों पर इमारत खड़ी हो रही है। ग्रेटर नोएडा में किसानों की जमीन के अधिग्रहण को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सरकारों और राजनीतिक दलों के नफे-नुकसान से कहीं अधिक जनभावनाओं से जुड़ा है। इस फैसले से साफ हो गया है कि औपनिवेशिक काल के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह देश को कहीं अधिक व्यावहारिक और सख्त कानून की जरूरत है, ताकि दांव-पेच कर किसानों की जमीनें हथियाई न जा सकें। एक अहम सवाल यह है कि वर्तमान भूमि अधिग्रहण पॉलिसी का स्वरूप कुटिल हो चला है। भूमि अधिग्रहण का मूल सिद्धांत है कि व्यापक जनहित के लिए निजी हित को छोडना होगा। पचास वर्ष पूर्व जमींदारी उन्मूलन कानून के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था। उस समय चन्द जमींदारों को बेदखल करके भूमि को असंख्य किसानों एवं भूमिहीनों में वितरित किया गया था। जबकि वर्तमान में एक्सप्रेस-वे बनाने के नाम पर किसानों की भूमि का जबरिया अधिग्रहण करके उसे निजी कंपनियों को दिया जा रहा है। एक तरह से कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार गरीब किसानों को जमीन से बेदखल करके पूंजीपतियों को लाभ पहुंचा रही है।
स्पेशल इकोनोमिक जोन एवं जल विद्युत परियोजनाओं में ऐसा ही किया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण को लेकर ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए कानून की बात करें तो किसी भी सार्वजनिक कार्य के लिए भूमि को अधिग्रहित किया जा सकता था। ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर ‘सार्वजनिक’ कार्य क्या है? इसकी व्याख्या का अधिकार सरकार को था। लिहाजा सरकार यदि कहती कि लाखों लोगों को बेदखल करके एक बिल्डर को भूमि देना सार्वजनिक हित में है, तो न्यायालय इसमें दखल नहीं करती थी। सिंगूर और नंदीग्राम में बंगाल की वामपंथी सरकार ने कुछ ऐसा ही किया था, जिसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ रहा है। जापान में भूमि अधिग्रहण के समय कई तरह के मुआवजे देने पडते हैं। इनमें अधिग्रहित की गई उतनी ही जमीन दूसरे स्थान पर खरीदने के लिए पर्याप्त रकम, खेती या व्यापार को स्थानान्तरित करने में हुए खर्च तथा उस दौरान कमाए जाने वाले लाभ की क्षति सहित कर्मचारियों को दिए जाने वाला वेतन, भूमि के मूल्य में भविष्य में होने वाली वृद्धि का अंश, सार्वजनिक प्रोजेक्ट के कारण भूमि के मूल्य में होने वाली वृद्धि, नए स्थान पर खेती या व्यापार जमाने का खर्च शामिल है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण कानून सख्त होने के कारण सार्वजनिक उपयोग के लिए भूमि की अधिकतर खरीद आपसी समझौते से की जाती है। इजराइल में भी भूमि अधिग्रहण कानून बहुत सख्त है। भारत देश में हरियाणा ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां की भू अधिग्रहण नीति स्पष्ट है। यहां किसानों की जमीन आपसी समझौते के आधार पर ली जाती है, जबकि अन्य राज्यों में भू अधिग्रहण की नीति स्पष्ट नहीं है। जानकारों का मानना है कि जापान की तर्ज पर भूमि अधिग्रहण कानून को सख्त बना देना चाहिए, तब इसका दुरुपयोग कम होगा। साथ ही सार्वजनिक प्रयोजन के लिए भूमि अधिग्रहण तब ही किया जाना चाहिए, जब 90 प्रतिशत भूमि स्वामियों ने स्वेच्छा से भूमि विक्रय कर दी हो। ऐसे में शेष 10 फीसदी भूमिधारकों के विरुद्ध अधिग्रहण उचित ठहराया जा सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की भट्टा से निकली पदयात्रा से जमीन का मसला और गरमा सकता है, लेकिन सियासत से हटकर देखें, तो सुप्रीम कोर्ट ने उपनिवेशकालीन भूमि अधिग्रहण कानून को आम आदमी के उत्पीड़न का जरिया बताया है। कोर्ट ने अपने फैसले में जमीन अधिग्रहण के नीति निर्धारण के लिए दिशा निर्देश तय कर दिए हैं, जिसे केंद्र के साथ ही तमाम राजनीतिक दल बदल सकते हैं और मानसून सत्र में प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून को पुख्ता बना सकते हैं। मगर दुख की बात यह है कि आम आदमी की बात करने वाली कांग्रेस तथा सर्वहारा वर्ग की हितैषी बनने वाली वामपंथी पार्टियां ही विकास के नाम पर गरीबों को कुचल रही हैं।